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बिहार की नदियों को समझे बिना बाढ़ का समाधान नहीं

— महेंद्र यादव

आज विश्व नदी दिवस है। बिहार के कोसी क्षेत्र में बैराज क्षेत्र में हुई वर्षा के कारण लोग बाढ़ में हैं और गंडक क्षेत्र में भी बाढ़ की स्थिति बनी हुई है。 अभी हाल ही में गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों में आई बाढ़ से पटना सहित अनेक जिलों के लगभग 50 लाख की आबादी प्रभावित हुई है。 इसमें कोसी और गंडक जैसी नदियों में बाढ़ का क्षेत्र घोषित नहीं होने से वह आधिकारिक रूप से शामिल नहीं है。 नेपाल और तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को गंडक की सहायक भोटे कोसी नदी में ग्लेशियर झील फटने के बाद आई भयावह त्रासदी के बाद बिहार के गंडक क्षेत्र में बहुत तबाही नहीं हुई, इसलिए नदियों और बिहार की बाढ़ की स्थिति को गहराई से समझकर उसके समाधान के उपायों की तलाश करना बेहद जरूरी हो जाता है。

इसकी पड़ताल में मुख्य बातें सामने आती हैं:

  1. भौगोलिक बनावट: भौगोलिक बनावट के कारण उत्तर बिहार की नदियां नेपाल और हिमालय से जुड़ी हैं, इसलिए हिमालय में घटित होने वाली घटनाएं सीधे तौर पर बिहार को प्रभावित करती हैं。

  2. गाद जमाव और बैराज की समस्या: उत्तर और दक्षिण बिहार की अधिकांश नदियां गंगा में मिलती हैं。 फरक्का बैराज के कारण गंगा में गाद (Silt) का जमाव हुआ है और जल निकासी प्रभावित हुई है。 इस बात को राज्य सरकार के 2017 के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के ‘पटना डिक्लेरेशन’ में भी उठाया गया था, जिसमें फरक्का बैराज को हटाने की जरूरत बताई गई थी。

  3. तटबंधों का बढ़ता जाल: आजादी के समय बिहार में तटबंधों की लंबाई मात्र 160 किमी थी, जो अब बढ़कर करीब 3,746 किमी हो गई है। वहीं दूसरी ओर, बाढ़ प्रभावित क्षेत्र 25 लाख से बढ़कर 68.8 लाख हेक्टेयर हो गया है।

  4. अवैध बालू उठाव: सोन, चनदन इत्यादि नदियों में अत्यधिक बालू के उठाव से नदियों का जीवन कुप्रभावित हुआ है।

  5. निकासी बाधित होना: इन्फ्रास्ट्रक्चर और निर्माण कार्यों के कारण पानी का स्वाभाविक निकास कई जगहों पर बाधित हुआ है।

  6. पारंपरिक जल प्रणालियों की उपेक्षा: पुराने जल प्रबंधन के उपाय, जिसमें तालाब, छोटे तालाब, आहार और पाइन शामिल थे, उनकी लगातार उपेक्षा हुई है।

  7. जलवायु परिवर्तन का असर: क्लाइमेट चेंज का असर यदि हिमालय में होगा, तो उसका सीधा प्रभाव बिहार पर पड़ेगा।

समाधान के लिए महत्वपूर्ण सुझाव:

उपरोक्त चुनौतियों को देखकर ही हमें समाधान की बात उठानी होगी और क्लाइमेट चेंज के खतरों को दृष्टि में रखकर योजनाएं बनानी होंगी:

  1. बेसिन आधारित योजना: नेपाल के साथ एक-एक नदी बेसिन के अनुसार योजना बनाकर मैक्रो और माइक्रो प्लानिंग करनी होगी। हाई डैम जैसी चर्चाओं के बजाय अन्य दूसरे-तीसरे व्यवहारिक उपायों पर काम होना चाहिए।

  2. गाद प्रबंधन नीति: गंगा नदी पर फरक्का के कारण हुए सिल्टेशन की समस्या के समाधान के लिए कार्य होना चाहिए। इस दिशा में गाद प्रबंधन नीति की तरफ बिहार का बढ़ना एक अच्छा कदम है।

  3. नीतिगत पुनर्मूल्यांकन: नेपाल सहित अन्य त्रासदियों को देखते हुए मौजूदा बैराज और तटबंध की नीति का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

कोसी की बाढ़ के स्थायी समाधान की जरूरत

कोसी नदी की बाढ़ के समाधान के लिए कोसी-मेची नदी जोड़ परियोजना पर काम चल रहा है। नेशनल वाटर डेवलपमेंट एजेंसी की डीपीआर के अनुसार, परियोजना पूरी होने पर 5,247 क्यूसेक अतिरिक्त पानी का निस्तारण हो सकेगा। इसके मुकाबले कोसी में कुल 3.19 लाख क्यूसेक से अधिक और 2024 की बाढ़ में 6.81 लाख क्यूसेक पानी का बहाव था। ऐसे में कोसी की 14 चैनल धाराओं की क्षमता बढ़ाकर नियंत्रित जल प्रवाह सुनिश्चित करना अधिक प्रभावी विकल्प हो सकता है। इसके लिए व्यापक समीक्षा और वैकल्पिक दृष्टिकोण अपनाया जाना जरूरी है।

(लेखक ‘कोसी नव निर्माण मंच’ और ‘नदी जीवन अभियान’ के संस्थापक हैं.)

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