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भारत- बांग्लादेश गंगा जल संधि और फरक्का बैराज के मुद्दे पर परिचर्चा

भारत- बांग्लादेश गंगा जल संधि और फरक्का बैराज के मुद्दे पर बाबू जगजीवन राम शोध संस्थान, पटना में एकदिवसीय परिचर्चा का आयोजन किया गया । यह परिचर्चा “Bihar Policy Dialogue” के बैनर तले आयोजित की गई जिसके संयोजक प्रो0 सुबोध कुमार हैं ।
इस परिचर्चा में प्रमुख वक्ता के तौर पर श्री उदय नारायण चौधरी जी(पूर्व विधानसभा अध्यक्ष), श्री मंगनी लाल मंडल जी(प्रदेश अध्यक्ष, राजद), नीलय उपाध्याय(जल विशेषज्ञ), श्री सुधाकर सिंह जी(मा. सांसद, बक्सर लोकसभा), ई0 संतोष शिव(पूर्व प्राचार्य, NIT Patna), शास्वत गौतम(राजद नेता), पद्मश्री प्रो0 रविंद्र सिन्हा(गंगा बेसिन विशेषज्ञ) मौजूद रहें ।
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री आदरणीय लालू प्रसाद यादव जी एवं जल संसाधन विभाग ने पूर्व मंत्री श्री जगदानंद सिंह के मार्गदर्शन में गंगा में जल की घटती उपलब्धता, अंतरराज्यीय जल उपयोग के प्रभाव और बिहार के हितों पर 64 पृष्ठों का ऐतिहासिक दस्तावेज़ तैयार किया था। उस दस्तावेज़ में संकलित अध्ययन, पत्राचार और भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि आज भी एक महत्वपूर्ण बहस का आधार हैं। इस पृष्ठभूमि में फरक्का बैराज को तोड़कर बिहार को बाढ़ से मुक्त कर देने के राजनीतिक दावे की तथ्यपूर्ण समीक्षा आवश्यक है। फरक्का बैराज को हटाना बिहार की बाढ़ समस्या का व्यावहारिक समाधान नहीं है। बिहार को पूरे हिमालय नेपाल उत्तर बिहार गंगा नदी तंत्र पर आधारित नीति चाहिए।
गंगा केवल 2,525 किलोमीटर लंबी एक पारिस्थितिक जीवनरेखा ही नहीं है बल्कि यह भारतीय संघवाद के भीतर गहराते जल-राजनीतिक (hydro-political) संघर्ष का केंद्र भी है । बिहार में गंगा की लगभग 16,205 वर्ग किलोमीटर लंबाई है और बिहार के भौगौलिक क्षेत्रों का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा गंगा नदी के मैदानी या उप-बेसन के अंतर्गत आता है और राज्य की आंतरिक सहायक नदियाँ शुष्क मौसम के दौरान नदी के कुल जल-प्रवाह का 50 प्रतिशत से अधिक योगदान देती हैं, फिर भी यह राज्य गंभीर निचले-तटीय (downstream) जलवैज्ञानिक उपेक्षा का शिकार है।
भारत में गंगा का जलग्रहण क्षेत्र लगभग 8.61 लाख वर्ग किलोमीटर था, जिसमें बिहार का हिस्सा 1,43,961 वर्ग किलोमीटर, अर्थात 16.71 प्रतिशत, बताया गया है। बिहार पर ऊपरी राज्यों में जल के उपयोग, नेपाल से आने वाली सहायक नदियों और निचली धारा की माँगों का संयुक्त प्रभाव पड़ता है। इसलिए राज्य की समस्या को किसी एक स्थान या संरचना से नहीं समझा जा सकता।
उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे ऊपरी-तटीय (upper-riparian) राज्य शहरी केंद्रों और गहन कृषि के लिए भारी मात्रा में जल का दोहन कर लेते हैं । परिणामस्वरूप, बिहार के पास नदी का प्राकृतिक प्रवाह अत्यधिक घटकर पहुँचता है । इसके बावजूद भी फरक्का में निचले-तटीय और अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति अधिदेशों (mandates) को पूरा करने का पूरा बोझ बिहार पर ही आता है ।
बिहार में विकास के संकट को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि कैसे ऊपरी-तटीय निष्कर्षण (extraction), केंद्रीय उपेक्षा और संधि आवंटनों ने बिहार को व्यवस्थित रूप से हाशिए पर धकेल दिया है । इसके अलावा, निचले-तटीय दायित्व यह अनिवार्य करते हैं कि फरक्का बैराज पर पर्याप्त जल प्रवाह पहुँचे ताकि कोलकाता एवं हल्दिया बंदरगाह पर राष्ट्रीय नौवहन मांगों को पूरा किया जा सके ।
कोलकाता एवं हल्दिया बंदरगाह केवल पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल जैसे लैंडलॉक राज्यों को समुद्री रास्तों से जोड़ता है । वहीं, बांग्लादेश के साथ अंतर्राष्ट्रीय संधि की शर्तों को भी निभाता है । परिणामस्वरूप, इस निचले-तटीय प्रवाह को बनाए रखने का बोझ लगभग पूरी तरह से बिहार के भीतर गंगा में मिलने वाली सहायक नदियों पर आ पड़ता है ।
बिहार सरकार ने अपने नागरिकों को बार-बार पड़ने वाले सूखे, भीषण बाढ़ और पारिस्थितिक असंतुलन से बचाने के लिए ऊपरी-तटीय राज्यों द्वारा जल के न्यायसंगत और उचित उपयोग का मौलिक मुद्दा बार-बार उठाया है ।
1991 में, राज्य ने जल संसाधन मुद्दों का मूल्यांकन करने के लिए द्वितीय बिहार राज्य सिंचाई आयोग का गठन किया । आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि शुष्क महीनों (मार्च और अप्रैल) के दौरान गंगा में उप-बेसिन का योगदान केंद्रीय जल आयोग (CWC) द्वारा 1982 में आकलित केंद्रीय आवश्यकताओं से काफी कम था, जिसने फरक्का में 1,500 क्यूसेक प्रवाह का अधिदेश दिया था । जिससे बिहार को लगभग अपने निर्धारित हिस्से से तिगुना मात्रा पानी देना पड़ता है ।
जल की उपलब्धता और निचले-तटीय अधिदेशों के बीच के इस अंतर को पाटने के लिए, केंद्र सरकार को ऊपरी-तटीय राज्यों द्वारा शुष्क मौसम (जनवरी से अप्रैल) में जल निष्कर्षण पर रोक लगानी होगी । निचले-तटीय हितों की रक्षा के लिए फरक्का में एक प्रभावी जल प्रवाह तंत्र की तत्काल आवश्यकता है ।
अंतर-राज्यीय और अंतरराष्ट्रीय बैठकों में बिहार की उपेक्षा
अंतर-राज्यीय और अंतरराष्ट्रीय बैठकों और चर्चाओं में बिहार को लगातार दरकिनार किया गया है । गंगा पर कानपुर बैराज (1995) के निर्माण के दौरान, उत्तर प्रदेश सरकार को विशेष चर्चा के लिए आमंत्रित किया गया था, जबकि निचले-तटीय हितों की अनदेखी की गई ।
30 जून 1995 को राज्य विधानसभा में एक बहस के दौरान, बिहार सरकार ने तर्क दिया था कि इससे पहले कि नदी का पारिस्थितिक स्वास्थ्य स्थायी रूप से खतरे में पड़े, केंद्र सरकार को इन प्रणालीगत असंतुलनों का समाधान करना चाहिए ।
बिहार ने बांग्लादेश के साथ 1996 की गंगा जल साझा संधि पर कड़ी असहमति जताई थी, क्योंकि एक प्रमुख तटीय राज्य होने के बावजूद उसे मुख्य वार्ताओं से बाहर रखा गया था । यद्यपि अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ पूरी तरह से केंद्र सरकार के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र में आती हैं, लेकिन जल प्रबंधन राज्य का विषय बना हुआ है ।
बिहार जैसे ऊपरी/मध्य-तटीय राज्यों को संधि वार्ताओं से बाहर रखने से सहकारी संघवाद में गंभीर असंतुलन पैदा होता है, विशेषकर तब जब पश्चिम बंगाल जैसे निचले-तटीय राज्य से व्यापक परामर्श किया जाता है ।
12 दिसंबर 1996 को हस्ताक्षरित 30-वर्षीय इस संधि का उद्देश्य बाढ़ प्रबंधन, सिंचाई, बेसिन विकास और जलविद्युत में आपसी लाभ के लिए गंगा के जल का बँटवारा करना है । यह संधि शुष्क मौसम के चरम समय में 50-50 प्रतिशत आवंटन का अधिदेश देती है, बशर्ते 1 मार्च से 10 मई के बीच बारी-बारी से 10-दिवसीय चक्रों में प्रत्येक देश को न्यूनतम 35,000 क्यूसेक जल प्राप्त हो ।
अंतर्राष्ट्रीय जल आवंटन में बिहार की आवाज सीमित होने के बावजूद, फरक्का बैराज में बिहार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है ।
शुष्क मौसम के दौरान जब गंगा उत्तर प्रदेश से बिहार के बक्सर में प्रवेश करती है तब उसका प्रवाह घटकर लगभग 4000 क्यूसेक रह जाता है । फरक्का में संधि द्वारा निर्धारित न्यूनतम सीमा को पूरा करने के लिए आवश्यक अतिरिक्त जल का 75 प्रतिशत हिस्सा बिहार की आंतरिक सहायक नदियाँ (गंडक, कोसी, घाघरा, महानंदा और सोन) प्रदान करती हैं ।
वहीं, पर्याप्त जल भंडारण सुविधाओं के अभाव में, मानसून का अनियंत्रित प्रवाह अत्यधिक बाढ़ के माध्यम से उत्तरी बिहार में व्यापक तबाही मचाता है । नेपाल में कोसी नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में एक बाढ़-नियंत्रण बांध का निर्माण बिहार की सुरक्षा और क्षेत्रीय विकास के लिए एक महत्वपूर्ण धुरी साबित हो सकता है ।
फरक्का बैराज, बाढ़ और गाद का प्रश्न
2007 की भीषण बाढ़ के बाद, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केंद्रीय जल आयोग, गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग और केंद्रीय जल एवं बिजली अनुसंधान स्टेशन के विशेषज्ञों के साथ एक उच्च स्तरीय तकनीकी समिति का गठन किया, जिसके प्रमुख नीलेन्दु सान्याल थे । समिति ने तटबंध टूटने से रोकने के लिए नियमित निगरानी, गाद हटाने (एंटी-सिल्टिंग) और ड्रेजिंग करने तथा नेपाल के साथ राजनयिक और तकनीकी समन्वय स्थापित करने की सिफारिश की थी । हालाँकि, इन सिफारिशों को कभी लागू नहीं किया गया ।
सान्याल समिति ने कभी भी फरक्का बैराज को बाढ़ के प्राथमिक कारण के रूप में चिन्हित नहीं किया और न ही इसे डीकमीशन (हटाने) की मांग की । इसके बावजूद फरक्का बैराज को अपनी ही सरकार के द्वारा बनाई गई सान्याल समिति की रिपोर्ट के विपरीत जाकर नीतीश सरकार ने वर्ष 2017 में केंद्रीय विशेषज्ञ समिति को एक प्रस्ताव सौंपा, जिसमें तर्क दिया गया कि फरक्का बैराज एक अवरोधक की तरह काम करता है क्योंकि यह ऊपरी हिस्से में भारी मात्रा में गाद को रोकता है, जिससे गंगा का नदी तल ऊँचा हो रहा है और बिहार में बाढ़ आती है ।
इस प्रकार बिहार ने आधिकारिक तौर पर केंद्र सरकार से इसे डीकमीशन करने पर विचार करने का अनुरोध किया । इसके विपरीत बिहार सरकार के द्वारा समय-समय पर बनाई गई तकनीकी समितियों ने फरक्का बैराज में गाद की समस्या को नहीं माना है ।
फरक्का बैराज का निर्माण 1961 में शुरू हुआ, जो विशेष रूप से गंगा का पानी भागीरथी-हुगली नदी प्रणाली की तरफ मोड़कर कोलकाता और हल्दिया बंदरगाहों से गाद को बहाने (फ्लश करने) के लिए किया गया था ।
फरक्का बैराज कोलकाता और हल्दिया बंदरगाहों के लिए एक आर्थिक जीवन रेखा है और बिहार जैसे भू-आबद्ध (landlocked) राज्य के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग भी है । जैसा कि हमें मालूम है कि भारत विभाजन के बाद गंगा नदी के निचले हिस्सा पूर्वी पाकिस्तान (तत्कालीन बांग्लादेश) के हिस्से में जाने के कारण बिहार, उत्तर प्रदेश एवं नेपाल के पास समुद्री व्यापार का रास्ता बंद हो गया था ।
वहीं, इसे हटाने से अंतर-राज्यीय संघर्ष भी बढ़ेगा क्योंकि पश्चिम बंगाल जल आपूर्ति, बिजली संयंत्रों और सिंचाई के लिए इस बैराज पर निर्भर है । केंद्रीय जल आयोग भी समय-समय पर गाद निकालने (desilting) और ड्रेजिंग को प्राथमिकता देता है ।
बिहार की दीर्घकालिक जल आवश्यकताएँ
द्वितीय बिहार राज्य सिंचाई आयोग के अध्ययन के आधार पर बिहार राज्य में वर्ष 2025 तक की प्रक्षेपित जल आवश्यकता तथा गंगा की सहायक नदियों से वर्तमान में उपलब्ध जल प्रवाह की तुलना की गई थी ।
इन आंकड़ों के अनुसार फरवरी से मई तक के महीनों में बिहार में गंगा जल की उपलब्धता राज्य की वास्तविक आवश्यकता की तुलना में काफी कम पड़ जाएगी ।
यह स्पष्ट करता है कि बिहार की कृषि, सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए गंगा बेसिन के जल संसाधनों का वैज्ञानिक एवं न्यायसंगत प्रबंधन आवश्यक है ।
24 जनवरी 1997 की सचिव-स्तरीय बैठक का ऐतिहासिक एवं लिखित आश्वासन
दिनांक 13.12.1996 को पटना प्रवास के दौरान तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री द्वारा यह आश्वासन दिया गया था कि भारत-बांग्लादेश समझौते (12.12.96) के क्रियान्वयन में बिहार राज्य के हितों की रक्षा की जाएगी, तथा राज्य की चिंताओं के समाधान हेतु केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय एवं बिहार सरकार के अधिकारियों की एक बैठक बुलाई जाएगी ।
इसी क्रम में दिनांक 24.1.1997 को नई दिल्ली में सचिव (जल संसाधन), भारत सरकार की अध्यक्षता में बिहार सरकार, केंद्रीय जल आयोग तथा गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग के अधिकारियों के मध्य एक बैठक सम्पन्न हुई, जिसकी कार्यवाही (Minutes of Meeting) आधिकारिक रूप से दर्ज है ।
इस बैठक के मद संख्या IX — “Effects of Indo-Bangladesh Treaty on utilisation of Ganga water in Bihar” — के अंतर्गत निम्नलिखित तथ्य आधिकारिक रूप से अभिलिखित हैं:
“Govt. of Bihar officers stated that Govt. of Bihar was not consulted before finalising the Indo-Bangladesh treaty on water sharing of Ganga. They stated that the Treaty provisions would have adverse effects on Bihar and requested intervention of Govt. of India in imposing restrictions on water utilisation by upper riparian states…”
बैठक में यह भी दर्ज किया गया कि गंगा जल बंटवारे के प्रश्न में सभी आठ गंगा बेसिन राज्यों को सम्मिलित करना आवश्यक होगा और यदि सह-घाटी राज्य आपसी सहमति तक नहीं पहुँचते हैं तो केंद्र सरकार का हस्तक्षेप अथवा न्यायाधिकरण आवश्यक हो सकता है ।
अर्थात, भारत सरकार के वरिष्ठतम अधिकारियों द्वारा स्वयं आधिकारिक रूप से यह स्वीकार किया गया था कि—
• भारत-बांग्लादेश जल संधि समझौता ऊपरी तटवर्ती राज्यों, जिसमें बिहार सम्मिलित है, के जलोपयोग पर किसी प्रकार का प्रतिबंध लगाने हेतु नहीं है ।
• बिहार द्वारा उठाई गई गंगा जल बंटवारे की मांग को पूरा करने हेतु सभी आठ गंगा बेसिन राज्यों को सम्मिलित करना आवश्यक है ।
• यदि राज्य आपस में सहमति तक नहीं पहुँच पाते, तो केंद्र सरकार का हस्तक्षेप अथवा न्यायाधिकरण आवश्यक होगा ।
यह एक लिखित, आधिकारिक एवं बाध्यकारी प्रतिबद्धता है, जिसका सम्मान दिसम्बर 2026 की आगामी समीक्षा में भारत सरकार द्वारा किया जाना नितांत आवश्यक है ।
दिसंबर 2026 की समीक्षा में बिहार की भागीदारी आवश्यक
1996 की गंगा जल साझा संधि 12 दिसंबर 2026 को अपनी 30 साल की समय सीमा पूरी कर रही है । बिहार सरकार को संधि वार्ताओं में औपचारिक प्रतिनिधित्व की मांग करनी चाहिए ।
भले ही जल बँटवारा केंद्र का विषय है, लेकिन बिहार इसके भौतिक परिणामों को भुगतता है । पश्चिम बंगाल के साथ संयुक्त नदी आयोग की वार्ता दल में एक संस्थागत भूमिका समय की मांग है ।
सम्राट चौधरी सरकार
को अगले 30 वर्षों के लिए कृषि, औद्योगिक और पेयजल आवश्यकताओं का व्यापक डेटा प्रस्तुत करना चाहिए । वहीं, बिहार द्वितीय सिंचाई आयोग के द्वारा वैज्ञानिक आँकड़ों को महत्वपूर्ण आधार प्रदान करना चाहिए ।
बिहार सरकार को केंद्र से मांग करनी चाहिए कि व्यवस्थित ड्रेजिंग पर एक राष्ट्रीय गाद प्रबंधन नीति लागू की जाए । केंद्र सरकार को ऊपरी-तटीय राज्यों को बिहार के साथ बातचीत करने के लिए कहना चाहिए ।
आगामी समय सीमा आधुनिक जलवायु डेटा का उपयोग करके 30 साल पुराने ढाँचे को अद्यतन (update) करने का अवसर प्रदान करती है । आज की आवश्यकता बिहार की सूखा और बाढ़ प्रबंधन से जुड़ी वैध चिंताओं को संबोधित करते हुए बांग्लादेश के साथ विदेशी संबंधों में संतुलन बनाए रखने की है ।
बिहार की प्रमुख मांगें
बिहार की दीर्घकालिक जल सुरक्षा और गंगा बेसिन के न्यायसंगत उपयोग के लिए केंद्र सरकार से निम्नलिखित मांगें की जाती हैं—
1. गंगा के ऊपरी तटवर्ती राज्यों द्वारा इस नदी के अंधाधुंध जलोपयोग पर तत्काल अंकुश लगाया जाए ।
2. गंगा के ऊपरी तटवर्ती राज्यों को इस बात के लिए बाध्य किया जाए कि “गंगा बेसिन व्यापक योजना 1988” में विभिन्न टर्मिनल बिन्दुओं पर आकलित जल उपलlब्धता सुनिश्चित करें ।
3. गंगा नदी जल में विभिन्न तटवर्ती राज्यों की हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए । इस हेतु सभी आठ गंगा बेसिन राज्यों को सम्मिलित करते हुए एक औपचारिक समिति/तंत्र गठित किया जाए, जैसा कि दिनांक 24.1.97 की बैठक में स्वयं भारत सरकार द्वारा स्वीकार किया गया था ।
4. जब तक गंगा नदी में जल की कुल उपलब्धता तथा विभिन्न उपयोगों हेतु आवश्यकता का आकलन कर सह-घाटी राज्यों के बीच हिस्सेदारी निर्धारित नहीं कर दी जाती, तब तक केंद्र सरकार द्वारा ऊपरी राज्यों की नई योजनाओं की स्वीकृति स्थगित रखी जाए ।
5. इसी प्रकार गंगा की अन्य सहायक नदियों — यमुना, गोमती, घाघरा इत्यादि — के लिए भी निर्णय लिया जाए ।
6. गंगा बेसिन में विभिन्न राज्यों का हिस्सा निर्धारण करते हुए यह भी सुनिश्चित किया जाए कि गंगा की सहायक नदियाँ संगम स्थल पर गंगा में कितना जल छोड़ें ।
7. गंगा बेसिन के सह-घाटी राज्यों में जल संसाधन विकास की उत्तरोत्तर बढ़ती मांग को ध्यान में रखते हुए, कोशी नदी के बराह क्षेत्र (नेपाल) में सप्तकोशी हाई डैम परियोजना के शीघ्र निर्माण हेतु प्राथमिकता दी जाए तथा इसे ब्रह्मपुत्र पर प्रस्तावित सनकोश परियोजना की प्राथमिकता के नाम पर पुनः पीछे न धकेला जाए ।
8. भारत-बांग्लादेश गंगा जल वार्ता में बिहार राज्य को औपचारिक हितधारक (Stakeholder) के रूप में सम्मिलित किया जाए तथा भविष्य में होने वाले किसी भी नए/संशोधित समझौते से पूर्व सभी सह-घाटी राज्यों की सहमति अनिवार्य रूप से ली जाए ।
9. राष्ट्रीय जलमार्ग-1, हल्दिया से इलाहाबाद, पर बक्सर/पटना तक वर्षभर न्यूनतम 2.5 से 3 मीटर की गारंटीड नौवहन गहराई (LAD) सुनिश्चित की जाए तथा एक स्पष्ट रूप से परिभाषित एवं नियमित रूप से मॉनिटर किया जाने वाला नौवहन चैनल विकसित किया जाए ।
10. गाद (सिल्ट) की समस्या के स्थायी समाधान हेतु एक वैज्ञानिक एवं नियमित डिसिल्टेशन/ड्रेजिंग व्यवस्था (River Training and Sediment Management Plan) राष्ट्रीय परियोजना के रूप में स्थापित की जाए तथा फरक्का जल-प्रबंधन में हुगली-प्रवाह के साथ-साथ बिहार तक नौवहन-योग्यता को भी अनिवार्य शर्त बनाया जाए ।
11. बक्सर, पटना (गायघाट), सारण (कालुघाट), भागलपुर, मोकामा, मुंगेर एवं कटिहार सहित उपयुक्त स्थानों पर आधुनिक बहु-विध (मल्टी-मॉडल) टर्मिनल एवं पोर्ट का विकास किया जाए तथा इन्हें रेल व राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क से जोड़ा जाए ।
12. फरक्का पर जल छोड़े जाने एवं रोके जाने की समय-सारणी (Water Release Scheduling) इस प्रकार नियंत्रित की जाए कि बिहार के हिस्से में वर्षभर नौकायन योग्य (Navigable) जल उपलब्ध रहे ।
13. गंगा में लगातार बढ़ रही बाढ़ की विभीषिका को देखते हुए ऊपरी राज्यों तथा नेपाल में निर्माणाधीन/प्रस्तावित सभी जलाशयों में फ्लड-कुशन का प्रावधान अनिवार्य किया जाए तथा बिहार में निर्माणाधीन तटबंध एवं कटाव-रोधी कार्यों हेतु केंद्रीय सहायता शीघ्र उपलब्ध कराई जाए ।
14. बिहार की बाढ़ की समस्या के निदान के लिए एक सामूहिक और कारगर नीति की आवश्यकता है, जिसमें गंगा बेसिन का रखरखाव और कुशल प्रबंधन, गाद की सफाई, अलग-अलग नदियों पर बाँध निर्माण परियोजनाएँ, नेपाल-भारत जल संरक्षण समझौता और नदियों के तटबंधों के सामयिक पुनरुद्धार की योजनाएँ शामिल हों।
निष्कर्ष
गंगा नदी बिहार और नेपाल के लिए केवल आस्था, सिंचाई अथवा पेयजल का साधन नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक संप्रभुता तथा समुद्र तक पहुँचने का एक महत्वपूर्ण स्वाभाविक द्वार है ।
दिसम्बर 2026 में फरक्का समझौते की आगामी समीक्षा बिहार के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है । यह अवसर बिहार की जल सुरक्षा, कृषि, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, नौवहन और आर्थिक हितों को अगले कई दशकों के लिए सुरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है ।
आज की आवश्यकता केवल जल बंटवारे की नहीं, बल्कि न्यायसंगत, वैज्ञानिक, पारदर्शी और सहयोगात्मक जल प्रबंधन व्यवस्था की है ।
बिहार को केवल गंगा के जल का उपभोक्ता नहीं, बल्कि गंगा बेसिन के निर्णयों में प्रमुख हितधारक और समान भागीदार बनाया जाना चाहिए ।
केवल एक सहयोगात्मक और न्यायसंगत ढाँचा ही गंगा की पारिस्थितिक स्वास्थ्य को बहाल करने के साथ-साथ सभी तटीय हितधारकों की सामाजिक और आर्थिक स्थिरता को सुरक्षित कर सकता है ।

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