संस्कृति एवं लोक-परंपरा | बिहार विमर्श
ग्रामीण बिहार की स्मृतियों में झांकें तो कुछ ऐसी वस्तुएं दिखती हैं जो सिर्फ घरेलू उपयोग का सामान भर नहीं थीं, बल्कि वे स्त्री-श्रम, कलात्मकता और लोक-सभ्यता की जीती-जागती प्रतीक थीं। इन्हीं में से एक है—‘सिकौहुली’ (जिसे कई इलाकों में वड़िया भी कहा जाता है)। आकार और बनावट के हिसाब से इससे छोटी ‘मौनी’ और ‘भौकी’ होती है, तो आकार में बड़ा ‘सिकौहुला’ होता है।
आज भले ही यह शिल्प वैश्विक हस्तशिल्प मेलों में ‘सिक्कि क्राफ्ट’ (Sikki Art) के नाम से नई पहचान पा रहा हो, लेकिन गाँव की चौपालों और कोहबर के आँगनों में इसका इतिहास सदियों पुराना है।
विदाई का दहेज और ‘गुनगर दुल्हनिया’
एक दौर था जब बिटिया की गवना या विदाई के समय रंग-बिरंगी डिजाइन वाली ढेरों वड़िया, मौनी, सिकौहुली और सिकौहुला संग भेजे जाते थे। ससुराल पहुँचने पर जब गाँव की महिलाएँ दुल्हन का सामान देखने आती थीं, तो इन कलाकृतियों को निहारकर बरबस कह उठती थीं— “हे बहिनी, दुल्हनिया तो बड़ी गुनगर (गुणवान) है!”
सिक्कि बिनने की यह कला किसी लड़की के सुघर होने और उसकी रचनात्मक क्षमता का मापदंड हुआ करती थी।
मूंज चिराई का मौसम और सहेलियों के गप्पे
शरद ऋतु के आगमन के साथ जब कास और मूंज में फूल नहीं आए होते हैं, तभी से गाँव की बहु-बेटियाँ सर्दियों भर के लिए मूंज सहेजने में जुट जाती हैं। सेठा (मूंज के पौधे का तना) की तीखी पत्तियों से हाथों को कटने से बचाने के लिए लड़कियाँ और महिलाएँ घर के पुरुषों (भैया या बाबूजी) का पुराना पूरी बांह का बुशर्ट पहनकर झुंड में निकलती हैं।
सड़क के किनारों या चौर (मैदानों) में एक-दूसरे से गपशप करते हुए मूंज चीरना, उसकी आंटी (बंडल) बनाना और उसे कंधे पर लादकर घर लाना—गाँव के जीवन का एक बेहद जीवंत दृश्य हुआ करता था। जिस घर की बेटियों का अगहन या फागुन में गवना तय होता था, वहाँ मूंज चिराई और कास कटाई की हलचल सबसे ज्यादा देखने को मिलती थी।

बनाने की कला: कास, मूंज और ‘छेदना’ का कमाल
सर्दियों की धूप सेकते हुए घर के काम-काज से जल्दी निबटकर महिलाएँ सिकौहुली बिनने बैठ जाती थीं। अगर कोई महिला किसी काम से उठती, तो दूसरी आकर मोर्चा संभाल लेती थी। इस सामूहिक श्रम से हफ्ते-दस दिन में एक सुंदर सिकौहुला तैयार हो जाता था।
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बुनाई की प्रक्रिया: कास से आधार (बारी) बनाई जाती है और पानी में भिगोए गए रंगीन मूंज के ‘बल्ले’ से उस बारी को कसा जाता है।
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‘छेदना’ का महत्व: सिकौहुली बनाने के लिए लोहे के एक खास औजार का प्रयोग होता है जिसे ‘छेदना’ कहते हैं। इसका अगला सिरा बेहद नुकीला होता है और पीछे लकड़ी की बींट लगी होती है। कास की बारी में छेदने से छेद किया जाता है और फिर मूंज का बल्ला पिरोकर बुनाई आगे बढ़ती है।
यह ‘छेदना’ सिर्फ सिक्कि बिनने के काम ही नहीं आता था। पहले के समय में शीशी के ढक्कन में छेद करके दीया बनाने में और विवाह के समय कोहबर में जब दूल्हा-दुल्हन पहुँचते थे, तो पछीलहरा (वैवाहिक अनुष्ठान) के दौरान दीये की बाती मिलाने के लिए भी इसी छेदने का प्रयोग होता था।
प्लास्टिक और तसले का आक्रमण: बाज़ार बनाम विरासत
जैसे-जैसे आधुनिकता आई और लोहे व प्लास्टिक के तसले, टब और बर्तन घरों में दाखिल हुए, वैसे-वैसे सिकौहुली और मौनी का पारंपरिक इस्तेमाल घटता चला गया। जो कला कभी हर ग्रामीण परिवार के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा थी, वह धीरे-धीरे कमरों के कोनों और टांड़ पर सिमटकर रह गई।
हालाँकि, आज ‘सिक्कि कला’ को सरकारी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जीआई टैग (GI Tag) और सम्मान मिल रहा है। प्रदर्शनियों में इसकी कीमतें काफी ज्यादा हैं और इसे बनाने वाली कलाकारों को सम्मानित भी किया जा रहा है। लेकिन कड़वा सच यह भी है कि जिस आम ग्रामीण रसोई और आँगन की यह शान हुआ करती थी, वहाँ अब यह इक्का-दुक्का ही बच गई है।
यदि हमने अपनी इस पारंपरिक लोक-कला को दैनिक जीवन और आधुनिक उपयोगिता से पुनः नहीं जोड़ा, तो आने वाली पीढ़ियाँ इसे केवल संग्रहालयों, तस्वीरों और महंगे शोरूमों में ही देख पाएंगी।