विशेष रिपोर्ट | बिहार विमर्श
बिहार की प्रतियोगी परीक्षाओं का इतिहास अनिश्चितता, लंबे इंतजार और प्रशासनिक सुस्ती के साये में आगे बढ़ता रहा है। राज्य के लाखों युवाओं के लिए सरकारी नौकरी का सपना किसी लंबी तपस्या से कम नहीं है। ताजा मामला बिहार कर्मचारी चयन आयोग (BSSC) की परीक्षाओं से जुड़ा है, जहाँ द्वितीय इंटर-स्तरीय संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा (विज्ञापन 02/23) से लेकर BSSC 4th Graduate Level (CGL-4) और अन्य महत्वपूर्ण भर्तियों तक, छात्रों के सामने असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
वर्ष 2023 में विज्ञापित द्वितीय इंटर-स्तरीय परीक्षा के लिए लगभग 26 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन किया और पदों की संख्या बढ़कर लगभग 24,492 तक पहुँची, लेकिन इसके बावजूद परीक्षा की ठोस और पारदर्शी समय-सारणी को लेकर स्पष्टता का अभाव युवाओं को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित कर रहा है।
अभ्यर्थियों की प्रमुख चिंताएं और माँगें
बिहार के विभिन्न जिलों से तैयारी कर रहे युवाओं का दर्द सिर्फ एक परीक्षा के विलंब का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता से जुड़ा है। उनकी मुख्य माँगें निम्नलिखित हैं:
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स्पष्ट एवं बाध्यकारी परीक्षा कैलेंडर: अभ्यर्थियों की सबसे बड़ी मांग एक ऐसा वार्षिक या पाक्षिक परीक्षा कैलेंडर जारी करने की है, जिसमें प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा, मूल्यांकन और परिणाम की तारीखें पूरी तरह तय और बाध्यकारी हों।
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25% संविदा वेटेज की समाप्ति: चयन प्रक्रिया में सभी सामान्य और योग्य अभ्यर्थियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने हेतु संविदा आधारित वेटेज की व्यवस्था को समाप्त किया जाए।
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पारदर्शी चयन प्रक्रिया और पेन-पेपर (Offline) मोड: बड़ी परीक्षाओं का आयोजन ऑफलाइन माध्यम से ओएमआर (OMR) शीट पर हो, ताकि परीक्षाओं की विश्वसनीयता बनी रहे। साथ ही, परीक्षा के उपरांत अभ्यर्थियों को प्रश्नपत्र और ओएमआर शीट की प्रति उपलब्ध कराई जाए।
पत्रकारिता और जन-संवाद का दायित्व
जब किसी राज्य के लाखों युवा अपनी ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा केवल परीक्षा की तिथि का इंतजार करने में गंवा देते हैं, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि पूरे समाज के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। यह समय सत्ता के गलियारों से यह पूछने का है कि एक विज्ञापन जारी होने के बाद चयन प्रक्रिया को तय समय सीमा में पूरा करने के लिए स्थायी और पारदर्शी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जाती?
युवाओं के रोजगार और भविष्य के मुद्दों को किसी राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। पारदर्शी परीक्षा, समय पर नियुक्ति और युवाओं के अधिकारों की रक्षा ही किसी भी प्रगतिशील समाज की बुनियादी शर्त है।