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भोजपुरी सिनेमा का बदलता चेहरा: “बोध”

शाम के आठ बजे कहीं पहुँचने के लिए घर से निकल रहे हों, तो घर में माँ को तो बताकर जाना होता है। देर रात गए लौटना होता। अब सोचिए, #भोजपुरी फिल्म देखने जा रहे हैं, ये कहना कैसा लगता? होते-होते छवि कुछ ऐसी हो गई है कि भोजपुरी फिल्म है, ये जरा दबी आवाज में बताना पड़ता है। खैर, सिनेमाघर बोलें तो मॉल में पहुंचे और देखा कि भीड़ कुछ ज्यादा ही है। दैनिक जागरण अखबार और फिल्म की टीम के लोग निवेदन करने में जुटे थे कि इस फिल्म फेस्टिवल में अट्ठारह से कम आयु के बच्चों को आने की इजाजत नहीं, हमारा लाइसेंस कैंसिल हो जाएगा। मजाल है कि पूरी बात सुनने के बाद भी युवतियाँ बच्चों समेत सीटों से हिलें? आखिर जब सीट नंबर बता-बता कर पुकारना शुरू किया गया तो कुछ जगह बनी, लेकिन अब भी सीढ़ियों तक पर लोग भरे थे।

हमने नजर खचाखच भरे हॉल से घुमाई और स्टेज के पास खड़े निर्माता-निर्देशक की ओर देखा। निःसंदेह वो लोग भी भीड़ से बैठ जाने के निवेदन में जुटे थे मगर दूर से भी हमें उनके चेहरे पर गोविंदा-सलमान का “इतनी खुशी” वाला मीम, साफ बना नजर आ रहा था। न कोई तथाकथित स्टार, न लम्बी फैन फॉलोइंग वाली हीरोइन, न किसी आइटम नंबर के चर्चे, और ऐसी भीड़? ऊपर से नजर घुमाने पर पटना में संस्कृतिकर्मियों और पढ़ने-लिखने के लिए जाने जाने वाले लोगों में से कई भीड़ में दिखाई दे रहे थे। निर्माता-निर्देशक और पूरी फिल्म की टीम का खुश होना तो बनता ही था। कई निवेदनों के बाद भीड़ थोड़ी संभली भी तो सीढ़ियों तक पर दो-तीन लोग बैठे थे और कुछ दीवारों के पास, थिएटर में खड़े थे। बत्तियां बुझीं और सेंसर बोर्ड के परंपरागत लाइसेंस के बाद पहले दृश्य की अटकी सी घड़ी ने करीब साढ़े नौ बजे का वक्त दिखाया।

सच कहें तो कोविड-19 का दौर चाहे जितना भी भयावह रहा हो, लेकिन फिल्म में जब दोबारा दिखाया गया कि पहले एक दिन का सांकेतिक सा लॉकडाउन लगा था और फिर असली वाला आया था, तो याद आया कि हाँ, हुआ तो ऐसा ही था। पास ही कोई महिलाएँ तब तक बातें करना शुरू कर चुकी थीं कि कैसे वो महीनों फ्लैट से बाहर नहीं आई थी, कैसे सब्जियां धोकर ली जाती थी। मुश्किल से दस-पंद्रह मिनट फिल्म आगे बढ़ी कि आसपास की बातचीत भी शांत होने लगी। अब सिर्फ भोजपुरी सुनाई दे रही थी, आस-पास से मगही-मैथिली आदि में चल रही बातचीत करने वाले लोग शांत हो चुके थे। फिल्म के कलाकारों ने कोई क्रन्तिकारी दृश्य नहीं दिखा दिए थे, एक साठ के करीब के बुजुर्ग प्रोफेसर थे जो बेस्टसेलर लेखक से प्रिंसिपल, वहाँ से वीसी और चुनाव, ऐसी ही रोजमर्रा की जिन्दगी में लगे थे।

प्रोफेसर साहब का परिवार था, बिटिया कहीं बंगलूरू में लॉ की पढ़ाई कर रही थी, बेटा अपनी माँ के साथ मौसी के घर गया हुआ था। मकान में दो किरायेदार लड़के थे, जिनके लिए खडूस प्रोफेसर ही मनोरंजन की वस्तु थे। जैसे हमलोगों के लिए संबंधों के मायने कोरोना काल में बदले थे, कुछ वैसे ही बदलते हुए रिश्ते फिल्म की कहानी में दिखते रहते हैं। थोड़े कम मुख्य पात्रों में एक मुन्ना दिखाई देता है। बिहार में कई लोग एब्सेंटी फार्मर होते हैं, बोलें तो वो लोग जिनके पास जमीन तो थी, मगर गाँव की जमीनें अब कोई और देखता है, वो शहर में नौकरी करते हैं। प्रोफेसर साहब की जमीन-खेती देखते इस मुन्ना के भाई जो वर्षों पहले इसे अपनी गरीबी से अकेले लड़ने के लिए छोड़कर शहरों की ओर निकल गए थे, वो कोरोना काल में लौट आते हैं। बिहार के दर्शकों को पुश्तैनी घर और जमीन से लेकर नाते-रिश्तों के हिस्सेदारी में होने वाला ये बँटवारा आसानी से समझ में आएगा। बिहार के बाहर के दर्शकों को ये दिखेगा या नहीं पता नहीं।

फिल्म जबतक समाप्त होती है, हमलोग देख चुके होते हैं कि प्रोफेसर साहब अकेले बैठे क्या-क्या करते हैं। पुरानी पेंटिग का शौक बिटिया याद दिला देती है। सख्त अनुशासन वाला प्रिंसिपल साहब का लहजा उनके किरायेदार लड़कों के लिए बदलता है। अखबार देने आने वाले लड़के से लेकर न्यूज़ एंकर का किरदार निभाने वाले तक को अपना-अपना हिस्सा मिला है। मुख्य किरदारों में जो प्रोफेसर, उनकी फोन पर बात करती पत्नी, बिटिया, दो किरायेदार रोहित, इत्यादि हैं, वो तो हैं ही। फिल्म समाप्त होती है तो कोई बहुत बड़ा सन्देश देकर जा रही हो, ऐसा नहीं होता। अंतिम दृश्य में घड़ी फिर से नजर आती है, इस बार वो डेढ़ बजे के आसपास होती है और शायद किसी ने बैटरी बदल दी थी, इसलिए वो चल भी रही होती है। कोविड-19 का दौर बीतने के बाद हमलोगों के लिए भी जीवन दोबारा चल पड़ा और फिर से वैसा दौर न ही देखना पड़े, ऐसी कामना ही लोगों की होती है।

फिल्म में कोविडकाल के दृश्यों को आगे-पीछे होते दिखाने के लिए ब्लैक-एंड-व्हाइट का प्रयोग किया गया है, कलर फिल्म के बीच इस अंतर से आसानी से समय का आगे पीछे होना महसूस किया जा सकता है। जहाँ तक बैकग्राउंड म्यूजिक का प्रश्न है, वो ना के बराबर है, हो सकता है कोविड-काल के सन्नाटे को दर्शाने के लिए ऐसा किया गया हो। फिल्म की एडिटिंग इत्यादि का काफी काम, जो पहले कोलकाता-मुंबई आदि के स्टूडियोज में ही संभव था, वो भी पटना में ही हुआ है। यानी ये भी कहा जा सकता है कि बदलती हुई फिल्म नीतियाँ बिहार सरकार के लिए कोई अनूठा प्रयास नहीं बल्कि एक मजबूरी रही होंगी। फिल्म निर्माण के क्षेत्र में अभी भी बहुत सा काम है जो नीतियों में सुधार के जरिये हो सकता है। सौ दिन चले ढाई कोस की गति से निःसंदेह बिहार सरकार वो भी कर ही लेगी।

फिल्म देखे जाने योग्य है। पूरे परिवार के साथ आराम से बैठकर देखी जा सकती है। उम्मीद है फिल्म-फेस्टिवल से आगे जब ये थिएटर तक आएगी, तो भी दर्शकों का प्यार बटोरेगी। फ़िलहाल तो एक अच्छी फिल्म सफलतापूर्वक बनाकर दर्शकों के सामने ले आने के लिए पूरी फिल्म टीम को बधाई!

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