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रानी विक्टोरिया, बलिया और जुबिली संस्कृत कॉलेज

वर्ष 1887 में स्थापित ‘जुबिली संस्कृत कॉलेज’ बलिया के सबसे पुराने शिक्षण संस्थानों में से एक है। 1837 में महज़ अठारह बरस की उम्र में रानी बनने वाली विक्टोरिया के राज्यारोहण के जब पचास साल पूरे हुए तो ब्रिटिश साम्राज्य ने इसे स्वर्ण जयंती (‘गोल्डन जुबिली’) के रूप में मनाया था। उस अवसर पर भारत में कई जगहों पर शिक्षण संस्थाएँ स्थापित हुई थीं, जिनके नाम में इस अवसर की याद में ‘जुबिली’ जुड़ा हुआ था। उल्लेखनीय है कि संस्कृत के विद्वानों को दी जाने वाली ‘महामहोपाध्याय’ की उपाधि का आरंभ भी उसी अवसर पर हुआ था। और तब बनारस के प्रसिद्ध संस्कृतज्ञ बापूदेव शास्त्री को ‘महामहोपाध्याय’ की पदवी दी गई थी।
बलिया ज़िले में भी उसी साल एक संस्कृत पाठशाला स्थापित हुई, जिसका नाम रखा गया ‘जुबिली संस्कृत पाठशाला’। आगे चलकर जब व्याकरण और साहित्य के विद्वान पंडित रामउदित उपाध्याय ‘जुबिली संस्कृत पाठशाला’ के प्रधानाचार्य बने और उनके मार्गदर्शन में इस संस्था ने संस्कृत अध्ययन को दिशा देने का काम किया। वर्ष 1932 में जुबिली संस्कृत कॉलेज को ‘व्याकराणाचार्य’ और 1952 में ‘साहित्याचार्य’ की मान्यता मिली।
उल्लेखनीय है कि रामउदित उपाध्याय संस्कृत के विद्वान पंडित रामसुचित उपाध्याय के छोटे भाई थे। सोनबरसा के इस परिवार ने संस्कृत, हिंदी और भोजपुरी साहित्य को जितना समृद्ध किया, वह बेमिसाल है। स्वयं रामउदित उपाध्याय संस्कृत के प्रकांड विद्वान, बनारस संस्कृत कॉलेज में संस्कृत के प्राध्यापक और प्रसिद्ध वैयाकरण तात्या शास्त्री (रामकृष्ण शास्त्री) के शिष्य रहे थे। आचार्य बलदेव उपाध्याय, कृष्णदेव उपाध्याय, वासुदेव उपाध्याय जैसे विद्वान उनके भतीजे थे। प्रासंगिक है कि पंडित रामउदित उपाध्याय ही बलदेव उपाध्याय के संस्कृत के पहले गुरु थे।
संस्कृत के पठन-पाठन के क्षेत्र में बलिया के योगदान के विषय में हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही लिखा है कि ‘इस भूमि ने संस्कृत के इतने विद्वान पैदा किए हैं कि कई गाँव ‘लहुरी काशी’ (छोटी काशी) होने का दावा करते हैं।’
‘जुबिली संस्कृत पाठशाला’ से पढ़ाई करने वाले विद्वानों में पंडित रामबालक शास्त्री का नाम अग्रणी है। आचार्य बलदेव उपाध्याय ने उन्हें ‘संस्कृत-प्रचारक विद्वान’ कहा था। आगे चलकर रामबालक शास्त्री बनारस के जयनारायण इंटर कॉलेज में संस्कृत के शिक्षक हुए और बनारस से निकलने वाले संस्कृत के साप्ताहिक पत्र ‘गांडीवम्’ के प्रकाशन-सम्पादन का श्रेय उन्हें ही जाता है।
बालेश्वर मंदिर के निकट स्थित ‘जुबिली संस्कृत कॉलेज’ के भवन-निर्माण के लिए भूमि-अधिग्रहण का काम मई 1914 में हुआ था। युक्त प्रांत की सरकार द्वारा बलिया में ‘जुबिली संस्कृत पाठशाला’ के निर्माण के लिए 1894 के भूमि अधिग्रहण क़ानून का इस्तेमाल करते हुए बिशुनीपुर मौजा से 0.29 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित की गई थी और इस संदर्भ में बनारस मंडल के कमिश्नर को युक्त प्रांत के सचिव द्वारा पत्र जारी किया गया था।

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