फ्लड, यानी बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए ‘सरकार बहादुर’ ने तटबंध बनाने की सोची। नेताजी ने वादा किया कि तटबंध बनाने से पानी नदी के किनारे तोड़कर बाहर नहीं आएगा और बाढ़ रुक जाएगी। सुनने में यह बात किसी भी दूसरे ‘समाजवादी’ वादे जैसी ही बड़ी मीठी और बहुत सच्ची सी लगती है। इसमें समस्या यह थी कि नदी साहेब के बनवाए मुनिस्पैलिटी का नाला नहीं होती; नदी जीती-जागती होती है। तो पहली दिक्कत यह थी कि उसकी जगह बदलती रहेगी। आज हमने जहाँ तटबंध बनाया है, कल वहाँ नदी होगी ही नहीं, तो तटबंध बेचारा कौन से पानी को रोकेगा?
दूसरी उससे भी बड़ी समस्या यह थी कि नदी में केवल पानी ही नहीं आ रहा होता, उसके साथ बालू और गाद (silt) भी बहकर आ रहे होते हैं। हिमालय जैसे नए पहाड़ों से निकलकर आने वाली नदियों में यह होना ही है। जी हाँ, हिमालय नया पहाड़ है। याद कीजिए, विंध्याचल पर खनन रुकवाने के लिए जो ‘समाजवादी’ नेताजी लोगों ने तर्क दिया था, वह क्या था? विंध्याचल सबसे पुरानी पर्वत शृंखला है और हिमालय उसकी तुलना में नया है; याद आ गया होगा। तो यह गाद पहले तो नदी के बाढ़ में फैलने के साथ इधर-उधर फैल जाती थी, मगर अब तटबंधों के कारण वह वहीं जमने लगी और नदी का तल ऊँचा होता गया।
जब तक यह सब हो रहा था, तब तक सरकारी साहबों को याद आया कि असल में पानी को निकलने का रास्ता नहीं मिलता, इसलिए ठहरे हुए पानी से शहरों में बाढ़ आ रही है। तो पानी की निकासी के लिए नाले बनाकर उन्हें नदी से जोड़ दिया गया, ताकि शहरों में जमा होने वाला पानी निकलकर इन नालों के ज़रिये नदी में बह जाए। अब दिक्कत यह थी कि पिछले सत्तर-अस्सी साल में जो तटबंध बनाए गए थे, उनसे नदी का तल तो ऊँचा हो गया था न? अब जब बाढ़ आएगी, तो नदी ऊँची जगह से बह रही है और आपके नाले नीचे हैं। पानी ऊपर से नीचे की तरफ ही बहता है—यह सामान्य वैज्ञानिक तथ्य है। तो जो नाले यानी चैनल बाढ़ रोकने के लिए बने थे, उनसे ही बाढ़ आने लगी।
तथ्य यह है कि बिहार के सारण जिले में माही नदी पर बने तटबंधों के कई जगह से टूटने से सारण जिले के सात प्रखंडों के 109 गाँवों में भीषण बाढ़ आई है और इस बाढ़ से 2.33 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। एक ही जिले के लगभग ढाई लाख लोगों के प्रभावित होने का सरकारी आँकड़ा ऐसे ही नहीं निकलता। आमतौर पर लोगों ने माही नदी का नाम भी नहीं सुना होता, क्योंकि यह गंडक नदी की सहायक धारा है। इसे किसी पुलिया से पार करते समय इसका नाम गूगल पर भी ढूँढना कठिन होगा। नहर जैसी दिखने वाली इस माही नदी में 109 गाँव डुबो देने लायक पानी आया कहाँ से?
इसके पीछे ‘नदियाँ जोड़ने’ की क्रांतिकारी ‘समाजवादी’ योजना है। सबको बराबर मिलना चाहिए—इक्विटी और इक्वालिटी नाम की कोई चीज़ होती है कि नहीं? किसी नदी में ज़्यादा, किसी में कम पानी क्यों रहेगा? तो इस ‘समाजवादी समानता’ के सिद्धांत के मद्देनज़र गंडक में गोपालगंज के हीरापाकड़ से शुरू होने वाला एक समानांतर चैनल बना। यह सारण जिले के हासिलपुर में गंगा से जाकर मिल जाता है। गंडक की मूल धारा से अलग यह लगभग 170 किलोमीटर लंबी धारा है। इसे कुछ इलाकों में ‘अकाली नाला (छाड़ी)’ कहते हैं, यानी पहले कभी यहाँ से गंडक बहती होगी, बाद में जब जगह बदल ली तो इसे छोड़ी हुई धारा/मार्ग यानी ‘छाड़ी’ कहा जाने लगा। कहीं-कहीं लोग इसके पुराने नाम से जोड़कर इसे ‘गंडकी’ बुलाते हैं। बाद में यही धारा ‘माही’ कहलाने लगती है। पुराना नदी मार्ग था, तो इस इलाके में वॉटर टेबल ऊँचा होता होगा, लेकिन अब इसमें बड़े नाले से अधिक पानी नहीं होता था।
सरकार बहादुर को जब 2023 में गंडक के इलाकों की बाढ़ समाप्त करने की सूझी, तो बिहार सरकार ने इस पुराने चैनल की खुदाई यानी “नदी जोड़ो परियोजना” की शुरुआत इस पर भी कर दी। लगभग 70 करोड़ रुपये लगाकर गंडक से अतिरिक्त पानी को माही में डालकर गंगा पहुँचाने का काम शुरू हुआ। बिहार की किसी छोटी सी गंडक नदी की सहायक नदी माही पर कोई परियोजना चल भी रही हो, तो देश को सत्तर करोड़ की छोटी-मोटी योजना क्यों सुनाई देती? कुल जमा 19 मीटर चौड़ी और 3 मीटर गहरी ही तो थी। सरकार बहादुर ने अपनी पीठ थपथपाई कि इससे गोपालगंज, सीवान और सारण के करीब 60 हजार हेक्टेयर क्षेत्र से जलजमाव और बाढ़ के पानी का निकास सुधर जाएगा, किसानों का भला होगा।
इस 2023 की योजना का असर हेडलाइंस में 2024 में पहुँचा। वे जो बिहार में एक-एक करके धड़ाधड़ पुल गिर रहे थे न, वे छह पुल/पुलिया इसी रास्ते के थे और उन पर ही नेशनल डिबेट चली थी।
इस चैनल का काम अभी पूरा नहीं हुआ है। यह बिलकुल वैसा ही काम है जैसा कोसी-मेची लिंक चैनल का काम है, जो कभी शुरू होता है और कभी ठहरता है। हाँ, जब हम कहते हैं कि नदियाँ जीवित प्राणियों जैसा बर्ताव करती हैं, उन्हें जीवित मानिए, तो तथाकथित प्रगतिशीलों को हज़म नहीं होता। जब रिवर लिंकिंग को हम मूर्खतापूर्ण योजना बताते हैं, तो नए-नए ‘हिन्दू’ बने लोगों को हम ‘सोरोस एजेंट’ भी लगते हैं। सुनने में अच्छा लगे न लगे, लेकिन तटबंध आदि बनाकर जो स्थिति कर ली है, उसमें बाढ़ के साथ जीना सीखना होगा। बाकी पहले स्वयं बाढ़ लाकर, फिर उसी की राहत की परियोजनाएँ लाने जैसा ‘समाजवाद’ तो जो है, सो है ही!