बिहार विमर्श डेस्क: आज का दिन बिहार के मानचित्र पर एक विशेष चमक रखने वाले जिले ‘भागलपुर’ के लिए उत्सव का है। अपनी ऐतिहासिक समृद्धता, सांस्कृतिक विरासत और अद्वितीय शिल्पकला के लिए विख्यात भागलपुर जिला आज अपना स्थापना दिवस मना रहा है। बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति विभाग तथा जिला प्रशासन द्वारा आयोजित इस त्रिदिवसीय (4 मई से 6 मई 2026) समारोह के अवसर पर आइए जानते हैं अंग जनपद की इस हृदयस्थली के बारे में विस्तार से।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: ‘अंग’ की राजधानी से आधुनिक शहर तक
भागलपुर का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि भारत की सभ्यता। पौराणिक काल में यह प्रसिद्ध ‘अंग महाजनपद’ का हिस्सा था, जिसकी राजधानी ‘चंपा’ हुआ करती थी। दानवीर कर्ण का शासन स्थल होने के कारण आज भी यहाँ की मिट्टी में उदारता और शौर्य की गंध रची-बसी है।
भौगोलिक व्यवस्था और जलवायु
भागलपुर बिहार के पूर्वी हिस्से में स्थित एक महत्वपूर्ण मैदानी जिला है।
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गंगा का सानिध्य: यह शहर पवित्र गंगा नदी के दक्षिणी तट पर बसा है। यहाँ गंगा का प्रवाह उत्तरवाहिनी (उत्तर की ओर बहने वाली) है, जिसे धार्मिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
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सीमाएँ: इसके उत्तर में पूर्णिया और मधेपुरा, दक्षिण में बांका, पूर्व में कटिहार और साहिबगंज (झारखंड), तथा पश्चिम में खगड़िया और मुंगेर जिले स्थित हैं।
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मिट्टी और कृषि: गंगा की जलोढ़ मिट्टी के कारण यहाँ की भूमि अत्यंत उपजाऊ है। यह क्षेत्र विशेष रूप से ‘जर्दालू आम’ और ‘कतरनी चावल’ के लिए विश्व प्रसिद्ध है, जिन्हें GI टैग भी प्राप्त है।
जनसांख्यिकी और आबादी
भागलपुर बिहार के घनी आबादी वाले जिलों में से एक है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहाँ की आबादी करीब 30 लाख से अधिक थी, जो वर्तमान में और बढ़ चुकी है। यहाँ की साक्षरता दर में पिछले दशकों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, और यह जिला ‘तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय’ के कारण पूरे पूर्वी भारत में शिक्षा के एक बड़े केंद्र के रूप में जाना जाता है।
भागलपुरी सिल्क: दुनिया भर में धाक
भागलपुर की सबसे बड़ी पहचान यहाँ का ‘तसर सिल्क’ है। इसे ‘सिल्क सिटी’ (Silk City) के नाम से जाना जाता है।
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हस्तशिल्प: यहाँ के बुनकरों के हाथों का जादू सदियों से वैश्विक बाजार में अपनी चमक बिखेर रहा है। भागलपुरी सिल्क साड़ियाँ और ड्रेस मटेरियल अपनी शुद्धता और बनावट के लिए यूरोप और अमेरिका तक निर्यात किए जाते हैं।
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मंजूषा कला: यहाँ की पारंपरिक लोक कला ‘मंजूषा’ सिल्क के कपड़ों पर उकेरी जाती है, जो सर्प पूजा और बिहुला-विषहरी की लोककथाओं पर आधारित है।
प्रमुख पर्यटन और दार्शनिक स्थल
यदि आप भागलपुर के भ्रमण पर हैं, तो यहाँ की विरासत आपको मंत्रमुग्ध कर देगी:
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विक्रमशिला विश्वविद्यालय: कहलगांव के पास स्थित इस प्राचीन विश्वविद्यालय के अवशेष नालंदा के समान ही गौरवशाली हैं। पाल वंश के दौरान यह बौद्ध शिक्षा का महान केंद्र था।
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अजगैबीनाथ मंदिर (सुल्तानगंज): यहाँ गंगा के बीच स्थित चट्टानों पर बना प्राचीन शिव मंदिर है। सावन के महीने में लाखों कांवड़िये यहीं से जल भरकर देवघर की पदयात्रा शुरू करते हैं।
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विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभयारण्य: भारत का एकमात्र डॉल्फिन अभयारण्य भागलपुर में गंगा नदी के विस्तार में स्थित है। यहाँ ‘सोंस’ (गांगेय डॉल्फिन) को अटखेलियाँ करते देखना एक अनूठा अनुभव है।
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मंदार पर्वत (बांका सीमा पर): पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय इसी पर्वत का उपयोग ‘मथानी’ के रूप में किया गया था।
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कुप्पा घाट: महर्षि मेहीं परमहंस का आश्रम, जो ध्यान और शांति के लिए प्रसिद्ध है।

स्थापना दिवस समारोह 2026: एक झलक
जिला प्रशासन द्वारा आयोजित इस वर्ष के कार्यक्रम (4-6 मई) में भागलपुर की कला को मुख्य स्थान दिया गया है:
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4 मई: उद्घाटन समारोह के साथ मंजूषा कला एवं फोटोग्राफी प्रदर्शनी का आयोजन।
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5 मई: आर्टिस्ट कैंप और पारंपरिक लोक नृत्य एवं गायन की प्रतियोगिताएं।
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6 मई: भागलपुर के इतिहास पर विचार गोष्ठी और धरोहर भ्रमण के साथ समापन।
निष्कर्ष
भागलपुर केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा है। यह उद्योग (सिल्क), कृषि (आम और धान), और ज्ञान (विक्रमशिला) का अद्भुत संगम है। स्थापना दिवस के इस अवसर पर हम सभी को संकल्प लेना चाहिए कि हम इस ऐतिहासिक नगर की स्वच्छता, सुरक्षा और इसके बुनकरों की समृद्धि में अपना योगदान देंगे।
भागलपुर स्थापना दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ!
लेखन: बिहार विमर्श टीम स्थान: अंग संस्कृति भवन, भागलपुर संग्रहालय
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