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क्या प्रशासनिक विफलता की ओर जा रहा है महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय?

राजेश सारथी की फेसबुक वाल से

महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय लम्बे समय से जिस दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है, वह केवल प्रशासनिक विफलता का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसे संस्थागत पतन का प्रतीक बन चुका है जहाँ सत्ता, संरक्षण और चयनात्मक कार्रवाई ने शिक्षा, नैतिकता और न्याय को लगभग निगल लिया है। जिस विश्वविद्यालय को भारतीय भाषाओं, वैचारिक स्वतंत्रता और गांधीवादी मूल्यों का केंद्र होना चाहिए था, वही आज भय, दमन, पक्षपात और प्रशासनिक संरक्षणवाद की प्रयोगशाला बनता जा रहा है।
सबसे गंभीर और लगातार उठता प्रश्न कार्यकारी कुलसचिव कादर नवाज़ की भूमिका को लेकर है। वर्ष 2019 से 2023 के बीच शिक्षक नियुक्तियों में कथित अनियमितताओं, वित्तीय मामलों में अपारदर्शिता, प्रशासनिक हस्तक्षेप, नियमों के चयनात्मक उपयोग और पद के दुरुपयोग जैसे आरोपों को लेकर अनेक शिकायतें विभिन्न स्तरों पर दी जाती रही हैं। विश्वविद्यालय के भीतर यह धारणा लगातार मजबूत हुई है कि कई विवादित नियुक्तियों और प्रशासनिक निर्णयों में उनकी सीधी भूमिका रही है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इतने गंभीर आरोपों और शिकायतों के बावजूद आज तक कोई प्रभावी, पारदर्शी और निर्णायक कार्रवाई सामने नहीं आई। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि आखिर ऐसा कौन-सा संरक्षण है जो हर शिकायत, हर जांच मांग और हर आरोप को प्रशासनिक फाइलों में दबा देता है?
विश्वविद्यालय समुदाय का एक बड़ा वर्ग यह मानने लगा है कि कुलपति कुमुन्द शर्मा द्वारा लगातार मौन बनाए रखना और कार्रवाई न करना केवल प्रशासनिक उदासीनता नहीं, बल्कि आरोपी अधिकारियों को खुला संरक्षण दिए जाने का स्पष्ट संकेत प्रतीत होता है। स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि जिन व्यक्तियों पर गंभीर आरोप हैं, उन्हें हटाने के बजाय और अधिक शक्तिशाली पदों पर बनाए रखा जा रहा है। कार्यकारी कुलसचिव के रूप में निरंतर बने रहना और अब स्थायी कुलसचिव पद दिए जाने की चर्चाएँ यह संदेश देती हैं कि इस विश्वविद्यालय में जवाबदेही नहीं, बल्कि सत्ता के प्रति वफादारी सबसे बड़ी योग्यता बन चुकी है। यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि पूरे संस्थागत ढाँचे के नैतिक पतन का संकेत है।
इसी दौरान 15 मई 2026 को एक विकलांग निम्न श्रेणी कर्मचारी के साथ हुई कार्रवाई ने प्रशासन के दोहरे चरित्र को और अधिक उजागर कर दिया। उपलब्ध तथ्यों के अनुसार कर्मचारी के मोबाइल में एक संदिग्ध .apk फ़ाइल सक्रिय हुई, जिसके बाद उसका मोबाइल और व्हाट्सएप असामान्य रूप से प्रभावित होने लगा। उसने घबराई हुई स्थिति में तत्काल प्रशासन को सूचित किया और स्वयं साइबर सेल तक पहुँचा। अर्थात विश्वविद्यालय प्रशासन प्रारंभ से ही जानता था कि मामला संभावित साइबर अपराध या डिजिटल छेड़छाड़ का हो सकता है। विडंबना देखिए कि जिस विश्वविद्यालय में आईटी और कंप्यूटर से जुड़े विभागों पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, जहाँ तकनीकी पाठ्यक्रम और तथाकथित विशेषज्ञ मौजूद हैं, वहीं एक साधारण Android Package Kit (.apk) फ़ाइल के माध्यम से होने वाले साइबर हमलों और डेटा चोरी की बुनियादी समझ तक प्रशासनिक निर्णयों में दिखाई नहीं दी। यदि इतनी मूलभूत तकनीकी समझ भी संस्थान विकसित नहीं कर पाया, तो यह विश्वविद्यालय की अकादमिक गुणवत्ता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
किन्तु सबसे भयावह पक्ष यह रहा कि बिना किसी स्वतंत्र डिजिटल फॉरेंसिक जांच, बिना तकनीकी विश्लेषण, बिना आरोपपत्र, बिना शिकायत की प्रति दिए, और बिना कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए उसे तत्काल निलंबित कर दिया गया। दस दिन बीत जाने के बाद भी पीड़ित कर्मचारी को यह तक ज्ञात नहीं कि उसके विरुद्ध आरोप क्या हैं, शिकायतकर्ता कौन है, और कौन से साक्ष्यों के आधार पर उसका भविष्य अंधकार में धकेल दिया गया। यह केवल प्रशासनिक संवेदनहीनता नहीं, बल्कि प्राकृतिक न्याय और विधिक प्रक्रिया की खुली अवमानना प्रतीत होती है।
विश्वविद्यालय में आज यह धारणा गहराती जा रही है कि कार्रवाई का पैमाना नियम नहीं, बल्कि व्यक्ति की जातीय पहचान, वैचारिक निकटता और सत्ता से संबंध है। यदि कोई प्रभावशाली गुट या संगठन विशेष से जुड़ा है तो गंभीर घटनाएँ भी औपचारिक कार्रवाई के बाद समाप्त हो जाती हैं। वहीं यदि कोई व्यक्ति प्रशासनिक विचारधारा से भिन्न हो, कमजोर वर्ग से हो, या प्रश्न उठाने का साहस करे, तो उसके खिलाफ वर्षों तक निलंबन, निष्कासन, मानसिक प्रताड़ना और कथित फर्जी मुकदमों का सिलसिला शुरू हो जाता है। यह किसी लोकतांत्रिक विश्वविद्यालय का वातावरण नहीं, बल्कि भय और दमन आधारित प्रशासनिक संस्कृति का उदाहरण प्रतीत होता है।
आज आवश्यकता केवल एक कर्मचारी को न्याय दिलाने की नहीं है, बल्कि पूरे विश्वविद्यालय प्रशासन की स्वतंत्र, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की है। शिक्षक नियुक्तियों से लेकर वित्तीय निर्णयों तक, प्रशासनिक संरक्षण से लेकर चयनात्मक कार्रवाई तक — हर स्तर की जवाबदेही तय होना आवश्यक है। अन्यथा यह विश्वविद्यालय शिक्षा का केंद्र कम और सत्ता-संरक्षित अनियमितताओं का प्रतीक अधिक बन जाएगा। जिस संस्थान का नाम महात्मा गांधी के नाम पर हो, वहाँ सबसे कमजोर व्यक्ति को सबसे अधिक संरक्षण मिलना चाहिए। लेकिन यदि उसी संस्थान में सबसे कमजोर, सबसे पहले कुचला जा रहा हो और सबसे शक्तिशाली सबसे अधिक संरक्षित हो, तो यह केवल प्रशासनिक संकट नहीं, बल्कि उस संस्थान की आत्मा के मर जाने का संकेत है।
कर्मचारी के मोबाइल फोन के कथित रूप से हैक होने के उपरांत, उनके नंबर से अन्य व्यक्तियों को भेजे गए संदेशों से संबंधित स्क्रीनशॉट संलग्न हैं:

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