केरल के कोचीन रियासत में एक युवती कुरियेडाथु थत्री (जिन्हें थथ्रिकुट्टी या सावित्री के नाम से भी जाना जाता है) को 1905 में व्यभिचार (अनैतिक संबंध) के आरोप में स्मार्तविचारम नामक एक कठोर पारंपरिक मुकदमे में घसीटा गया। यह मुकदमा नंबूदरी ब्राह्मण समाज में तबकी धार्मिक और कानूनी परम्पराओं के निर्धारण का एक नियम था जिसे पुरुष-प्रधान और स्त्री शुद्धता जांचने वाला घोषित करने की आधुनिक नारीवादी रस्म चलती है। लेकिन जब पूरी घटना बता दी जाती है तो चाल ही उल्टी पड़ जाती है! इस मामले में थत्री ने न सिर्फ आरोप स्वीकार किए, बल्कि पूरे समाज की पोल खोल दी।
नंबूदरी समाज की कठोर व्यवस्था
उस समय केरल के ऊँची जाति के नंबूदरी ब्राह्मणों में स्त्रियों (जिन्हें अंतर्जनम कहा जाता था) और पुरुषों, दोनों पर बहुत सख्त नियम थे। लड़कियों की शादी बहुत कम उम्र में (अक्सर 11-13 साल में) कर दी जाती थी। पुरुष कई पत्नियाँ रख सकते थे, लेकिन महिलाओं के लिए यह पूरी तरह वर्जित था। अगर किसी महिला पर व्यभिचार का संदेह होता, तो धार्मिक शास्त्रार्थ जैसा ही चलने वाला स्मार्तविचारम शुरू हो जाता।
इसमें पुरुष बुजुर्गों (स्मार्तन) की एक पैनल स्त्री से अकेले में महीनों तक पूछताछ करती थी, जब तक मामले का पूरा सच बाहर न आ जाए। दोषी पाए गए स्त्री-पुरुषों को समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था – ये सिर्फ घर से निकाल दिया जाना नहीं होता, उनसे कोई संपर्क नहीं रख सकता था।
थत्री की कहानी
थत्री की शादी बचपन में ही रामन नंबूदरी से हो गई थी। किंवदंतियाँ पति के पहले से कई पत्नियाँ रखने की बात भी करती हैं, लेकिन ये दावे से नहीं कहा जा सकता। थत्री को किसी कारण पति ने असहाय छोड़ दिया था। अकेली और बिना सहारे के थत्री ने जीविका के लिए वेश्यावृत्ति शुरू की (अपनी सुविधा के लिए कुछ इतिहासकार इसे आर्थिक मजबूरी नहीं विद्रोह बताते हैं)। थत्री के पति ने उसपर 1904-1905 में व्यभिचार का आरोप लगाया और परिणाम ये हुआ कि आरोप सही हैं या नहीं, इसके लिए स्मार्तविचारम शुरू हो गया। यह मुकदमा लगभग 6 महीने चला – जी हाँ, आज की कानूनी प्रक्रिया जैसा “तारिख पर तारिख” वाला मामला नहीं चलता था।
थत्री का ऐतिहासिक विद्रोह
थत्री ने आरोपों से इनकार नहीं किया। उन्होंने आरोप तो स्वीकारे ही, साथ ही जिनसे उसके सम्बन्ध रहे थे, उनका नाम भी बताना शुरू किया – कुल 64 पुरुषों के नाम उन्होंने बताए, जिनके साथ उनके संबंध होने का दावा किया। ये नाम कोई साधारण लोग नहीं थे – कई बड़े-बड़े विद्वान, पुजारी, मंदिर के सहायक, समाज के प्रभावशाली नेता शामिल थे। जब कई पुरुषों ने इनकार किया, तो थत्री से और प्रमाण मांगे गए, जो थत्री ने दिए भी – जन्म के निशान, शारीरिक बनावट, निजी मुलाकातों की बातें, खास यादें—ऐसी जानकारी जो झुठलाई नहीं जा सकी।
अब मामला केवल थत्री को दोषी ठहराकर सजा देने का रहा ही नहीं, कई सफेदपोश खुद दोषी साबित हो रहे थे।
परिणाम और प्रभाव
थत्री को बहिष्कृत कर दिया गया। नामित पुरुषों में से कई को भी बहिष्कृत किया गया। पूरे समाज में हड़कंप मच गया। इतने सारे प्रभावशाली लोगों के गिरने से समाज की सत्ता कमजोर पड़ गई। कोचीन के महाराजा को हस्तक्षेप करना पड़ा और मुकदमे को रोकना पड़ा। कुछ किंवदंतियों में कहा जाता है कि अगला नाम महाराजा का ही होने वाला था, इसलिए इसे रोका गया।
यह केरल में आखिरी प्रमुख स्मार्तविचारम केस माना जाता है। इसके बाद इस प्रथा की वैधता पर सवाल उठे और जिसमें पुरुषों को ही दोषी घोषित किया जा सके वो फिरंगी (इसाई) कानूनों को स्वीकार नहीं हुई। दोषी को स्त्री-पुरुष होने के आधार पर अलग-अलग दंड न दे, पुरुषों की पैरोकारी न करे, ऐसी व्यवस्था को धीरे-धीरे कुचल दिया गया। थत्री के बाद की जिंदगी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन उनकी इस घटना से सामाजिक सुधारों नाम पर किये जा रहे तथाकथित आधुनिक बदलावों पर गहरा सवाल खड़ा होता है।
यह कहानी सिर्फ एक महिला के मुकदमे की नहीं, बल्कि दमित स्त्री की उस न सुनाई देने वाली आवाज की है जिसने सिस्टम को ही उलट दिया। थत्री ने साबित कर दिया कि सत्ता के खेल में कभी-कभी सबसे कमजोर दिखने वाला व्यक्ति सबसे बड़ा उलटफेर कर सकता है।
(यह घटना कई किताबों, जैसे आलंकोड लीलाकृष्णन की रचनाओं और जेंडर स्टडीज के जर्नल्स में दर्ज है।)