सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस पर लगी रोक – बिहार

पटना | राज्य डेस्क बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने राज्य की चिकित्सा व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए एक ऐतिहासिक संकल्प जारी किया है। ‘सात निश्चय-2’ के अंतर्गत घोषित कार्यक्रमों के तहत अब सरकारी डॉक्टरों के निजी क्लीनिक चलाने या निजी प्रैक्टिस करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की तैयारी पूरी कर ली गई है।

निर्णय का मुख्य आधार

बिहार सरकार के संकल्प (संख्या 03/जन-02/2022) के अनुसार, राज्य सरकार ने स्वास्थ्य विभाग के उस प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी है जिसमें सरकारी सेवाओं में कार्यरत चिकित्सकों की निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने की बात कही गई है। यह निर्णय मुख्य रूप से ‘सात निश्चय-2’ योजना की कंडिका 5(च) के तहत लिया गया है।

किन पर लागू होगा यह प्रतिबंध?

यह आदेश एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति के अंतर्गत निम्नलिखित संवर्गों पर प्रभावी होगा:

  • बिहार स्वास्थ्य सेवा संवर्ग: राज्य के विभिन्न सरकारी अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सक।

  • बिहार चिकित्सा शिक्षा सेवा संवर्ग: मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत डॉक्टर और शिक्षक।

  • इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान (IGIC): इस प्रतिष्ठित संस्थान के चिकित्सक और शिक्षक भी इस दायरे में आएंगे।

गैर व्यावसायिक भत्ता (NPA) और प्रोत्साहन

सरकार केवल प्रतिबंध ही नहीं लगा रही, बल्कि इसके बदले चिकित्सकों को आर्थिक सुरक्षा भी प्रदान करेगी। दस्तावेज़ के अनुसार:

  • चिकित्सकों को निजी प्रैक्टिस न करने के बदले गैर व्यावसायिक भत्ता (Non-Practicing Allowance – NPA) या प्रोत्साहन राशि दी जाएगी।

  • इस भत्ते के भुगतान और इसके क्रियान्वयन के संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश सक्षम प्राधिकार के अनुमोदन के बाद अलग से जारी किए जाएंगे।


यह निर्णय बिहार की स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हो सकता है। सरकारी डॉक्टरों के निजी प्रैक्टिस पर रोक लगने से सरकारी अस्पतालों में उनकी उपलब्धता बढ़ेगी, जिससे गरीब मरीजों को बेहतर और समय पर इलाज मिल सकेगा। हालाँकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार NPA (Non-Practicing Allowance) का निर्धारण कितनी सक्षमता से करती है, ताकि मेधावी डॉक्टर सरकारी सेवाओं के प्रति प्रोत्साहित रहें।

बिहार सरकार का यह संकल्प राज्य में ‘स्वास्थ्य के अधिकार’ को ज़मीनी स्तर पर मजबूत करने की एक ईमानदार कोशिश है।

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