आजकल सोशल मीडिया पर हर कोई हर मुद्दे पर विशेषज्ञ बन रहा है। लेकिन नसीम निकोलस तालेब की मशहूर किताब ‘स्किन इन द गेम’ (Skin in the Game) हमें एक बहुत कड़वा और ज़रूरी सबक सिखाती है—अगर किसी मुद्दे पर बोलते वक्त आपका खुद का कुछ दाँव पर नहीं लगा है, तो आपकी राय ‘अप्रासंगिक’ है।
इसे कुछ उदाहरणों से समझिए:
📍 यूनिवर्सिटी फीस: अगर कोई व्यक्ति फीस बढ़ने का विरोध कर रहा है, लेकिन न तो वह खुद वहां पढ़ता है और न ही उसका कोई बच्चा उस सिस्टम का हिस्सा है, तो उसकी आवाज़ सिर्फ एक शोर है।
📍 महंगाई का रोना: जो व्यक्ति खुद शुद्ध शाकाहारी है, अगर वह चिकन या अंडों की बढ़ती कीमतों पर छाती पीट रहा है, तो उसकी बात सुनने का कोई तुक नहीं बनता। उसे उस महंगाई की तपिश महसूस ही नहीं हो रही है!
📍 नेताओं का दोहरा मापदंड: बात जब नीति-निर्धारण की आती है, तो हमारे माननीय सांसद निशिकांत दूबे जैसे उदाहरण सामने आते हैं। सार्वजनिक चर्चा है कि उनके बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं। ऐसे में जब वे भारतीय यूजीसी (UGC) या शिक्षा व्यवस्था पर ज्ञान देते हैं, तो वह बात बेमानी हो जाती है। जब आपका अपना भविष्य उस सिस्टम से नहीं जुड़ा, तो आपकी राय में वो ईमानदारी कहाँ से आएगी?
असली समस्या क्या है? तालेब यही समझाते हैं कि दुनिया उन लोगों से भरी पड़ी है जो दूसरों के लिए नीतियां तो बनाते हैं, लेकिन उन नीतियों के फेल होने का हर्जाना उन्हें खुद नहीं भुगतना पड़ता।
अफसोस की बात: इतनी शानदार और व्यावहारिक बातें अक्सर अंग्रेजी की ‘बेस्टसेलर’ किताबों तक सिमट कर रह जाती हैं। हिंदी पट्टी में ऐसी वैचारिक और प्रहार करने वाली पुस्तकें या तो लिखी नहीं जा रही हैं, या फिर मार्केटिंग के अभाव में चर्चा का विषय नहीं बन पातीं।
अगली बार जब किसी की राय सुनें या किसी बहस में पड़ें, तो खुद से एक सवाल ज़रूर पूछें— “क्या इस आदमी की ‘स्किन’ इस गेम में शामिल है?” अगर नहीं, तो उसकी बात को ‘स्पैम’ समझकर इग्नोर करना ही बेहतर है।
आप क्या सोचते हैं? क्या बिना किसी निजी हित के दी गई राय वाकई मायने रखती है?
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