आज एक बार फिर एक ऐसे विषय पर जो हमारे राज्य ‘बिहार’ के भविष्य से सीधे जुड़ा है— बेरोजगारी।
हाल ही में जारी PLFS 2025 (पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे) के आंकड़ों ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है। जब हम भारत के नक्शे पर नजर डालते हैं, तो बिहार की स्थिति हमें सोचने पर मजबूर कर देती है। एक अनुभवी लेखक के तौर पर मैं इन नंबरों के पीछे छिपी उस हताशा को देख पा रहा हूँ, जिसे हमारा युवा हर रोज महसूस करता है।
क्या कहते हैं बिहार के आंकड़े?
इन्फोग्राफिक के अनुसार, 15-29 वर्ष की आयु वर्ग में बिहार की अनुमानित युवा बेरोजगारी दर 12.1% है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत (9.9%) से कहीं अधिक है। इसका मतलब यह है कि बिहार के हर 100 युवाओं में से कम से कम 12 ऐसे युवा हैं जो काम करने के इच्छुक हैं, योग्यता रखते हैं, लेकिन उनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं है।
पड़ोसी राज्यों की तुलना करें तो:
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उत्तर प्रदेश: 7.7% (बिहार से बेहतर स्थिति)
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झारखंड: 8.2% (बिहार से बेहतर स्थिति)
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पश्चिम बंगाल: 10.6% (बिहार से बेहतर स्थिति)
यह स्पष्ट है कि हिंदी पट्टी के अन्य राज्यों की तुलना में बिहार का युवा आज भी रोजगार के लिए अधिक संघर्ष कर रहा है।

बेरोजगारी के पीछे का दर्द: सिर्फ नंबर नहीं, जिंदगियां हैं
एक कंटेंट राइटर के तौर पर मैंने कई ऐसे युवाओं के इंटरव्यू लिए हैं जो सरकारी परीक्षाओं की तैयारी में सालों खपा देते हैं। 12.1% की यह दर केवल एक सांख्यिकी नहीं है, बल्कि:
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पलायन की मजबूरी: जब अपने राज्य में काम नहीं मिलता, तो मेधावी युवा दूसरे राज्यों (जैसे गुजरात, जहाँ बेरोजगारी दर मात्र 2.5% है) का रुख करते हैं।
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मानसिक तनाव: सालों की पढ़ाई के बाद भी हाथ खाली रहना युवाओं में कुंठा और तनाव पैदा कर रहा है।
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कौशल की कमी बनाम अवसरों की कमी: बिहार में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन उद्योगों का अभाव और निवेश की सुस्त रफ़्तार अवसरों के द्वार बंद कर देती है।
समाधान की दिशा में क्या होना चाहिए?
आंकड़े डराने के लिए नहीं, बल्कि हमें जगाने के लिए होते हैं। अगर बिहार को इस 12.1% के जाल से बाहर निकलना है, तो हमें कुछ ठोस कदम उठाने होंगे:
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औद्योगिक निवेश: बिहार को ऐसे माहौल की जरूरत है जहाँ निजी कंपनियां अपने ऑफिस और कारखाने खोल सकें।
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MSME को बढ़ावा: छोटे और मंझोले उद्योगों को सब्सिडी और सरल ऋण देकर स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा किए जा सकते हैं।
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स्किल डेवलपमेंट: पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ युवाओं को आज के दौर की तकनीकों (जैसे AI, डिजिटल मार्केटिंग) में दक्ष बनाना होगा।
अंतिम शब्द
बिहार की मेधा पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है, लेकिन जब तक हमारे अपने राज्य का नक्शा बेरोजगारी के ‘लाल’ रंग (High Unemployment) से रंगा रहेगा, तब तक हम पूर्ण विकास का दावा नहीं कर सकते। 2025 के ये आंकड़े एक चेतावनी हैं कि अब ‘पॉलिसी’ से आगे बढ़कर ‘डिलीवरी’ पर ध्यान देने का समय आ गया है।