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‘पहुंच से पूर्णता तक’: पटना में संपन्न हुआ दो दिवसीय राष्ट्रीय संवाद, सामाजिक सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन पर बनी व्यापक सहमति

पटना, 23 सितंबर 2026 (बिहार विमर्श): बिहार में आपदा जोखिम न्यूनीकरण, जलवायु परिवर्तन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की जमीनी पहुंच से जुड़े मुद्दों पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय बहु-हितधारक संवाद ‘पहुंच से पूर्णता तक’ बुधवार को पटना के होटल मौर्या स्थित कौटिल्य हॉल में सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। 22 और 23 सितंबर को आयोजित इस महत्वपूर्ण संवाद में सरकारी विभागों, शोध एवं अकादमिक संस्थानों, विकास क्षेत्र, सामाजिक संगठनों और समुदायों के सैकड़ों प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम का आयोजन ‘युगांतर’ द्वारा जर्मन सहयोग एवं कैरितास जर्मनी के सहयोग से किया गया था।

योजनाओं के नामांकन से लेकर वास्तविक लाभ तक की तलाश

संवाद का उद्घाटन 22 सितंबर को बिहार सरकार के मंत्री श्री राम कृपाल यादव ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया था। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि सरकारी योजनाओं की केवल पहुंच और कागजी नामांकन तक सीमित रहने के बजाय, उनका वास्तविक लाभ अंतिम चरण और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने में कहां और क्यों रुक जाता है।

उद्घाटन सत्र में युगांतर के कार्यकारी निदेशक श्री संजय पांडेय ने स्वागत एवं उद्घाटन वक्तव्य दिया, जबकि हरित विकास एवं लचीलापन केंद्र के फेलो श्री मणि भूषण ने कार्यक्रम की पृष्ठभूमि और संदर्भ प्रस्तुत किया। डीसीवी के कार्यक्रम समन्वयक श्री सुमन खड़का ने भी अपने विचार साझा किए।

पटना और सीतामढ़ी के अध्ययन से खुले कई राज़

तकनीकी सत्र ‘आंकड़े क्या बताते हैं: पहुंच, पूर्णता और इनके बीच के परिवार’ में पटना और सीतामढ़ी जिलों में किए गए जमीनी अध्ययन के निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए। इसमें सार्वभौमिक अधिकारों तक पहुंच, आय-सुरक्षा योजनाओं में नामांकन, जागरूकता की कमी, दस्तावेजों की जटिलता और भूमि-अधिकार से जुड़े अभिलेखों की गंभीर चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई। अध्ययन के निष्कर्ष युगांतर के समन्वयक श्री रवि कुमार ने रखे। सत्र की अध्यक्षता पटना विश्वविद्यालय के भू-विज्ञान विभाग के प्रो. अतुल आदित्य पांडेय ने की, जिसमें डॉ. विवेक कुमार सिंह, डॉ. जीवन कुमार, श्री गौरव कुमार श्रीवास्तव, डॉ. निहारिका कुमारी और सुश्री पूनम पांडेय ने अहम टिप्पणियाँ कीं।

जलवायु अनुकूलन और सामाजिक सुरक्षा का ताना-बाना

समारोह के पहले दिन ‘जलवायु अनुकूलन के लिए सामाजिक सुरक्षा का आधारभूत ढांचा’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में सामाजिक सुरक्षा को जलवायु जोखिमों और आपदाओं के समय परिवारों की सुरक्षा का मुख्य माध्यम बताया गया। इसमें आपदा प्रबंधन विभाग के अपर सचिव श्री एम. नादिमुल गफ्फार सिद्दीकी, श्री संजय कुमार सिन्हा, सुश्री अहाना चटर्जी, श्री प्रणव के. चौधरी और श्री संजय आर्या ने अपने विचार रखे। इस दौरान स्टार्ट नेटवर्क, लंदन की निदेशक सुश्री लुक्रेशिया पुएंतेस ने जलवायु लचीलेपन पर वैश्विक परिप्रेक्ष्य रखा।

पहले दिन का दूसरा सत्र ‘जमीनी पड़ताल: बाढ़ क्षेत्र और बस्ती में अपने अधिकारों एवं सुविधाओं का दावा’ समुदायों के अनुभवों पर केंद्रित रहा, जिसमें बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की विसंगतियों और बटाईदारों की समस्याओं पर मंथन हुआ।

दूसरे दिन समाधान और अन्य राज्यों के मॉडलों पर मंथन

संवाद के दूसरे दिन की शुरुआत पिछले दिन की चर्चाओं के पुनरावलोकन से हुई। पूर्ण सत्र के मुख्य अतिथि बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के सदस्य श्री पी.एन. राय (आईपीएस) ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण के साथ सामाजिक सुरक्षा को प्रभावी ढंग से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। श्रम संसाधन एवं प्रवासी श्रमिक कल्याण विभाग की सहायक श्रम आयुक्त सुश्री नेहा आर्या ने भी मुख्य वक्तव्य दिया।

‘कहीं और क्या काम कर रहा है: दूसरे राज्यों और तुलनीय परिस्थितियों के वितरण मॉडल’ विषयक सत्र में देश के अन्य हिस्सों में चल रहे एकल-खिड़की व्यवस्था, शिविर आधारित वितरण और नेपाल से प्राप्त अनुभवों पर चर्चा हुई। इस सत्र में श्री ज्योतिराज पात्रा, श्री अभिषेक कुमार, श्री बिपिन बिहारी, श्री लक्ष्मी प्रसाद भट्ट, श्री वेंकट जयगोपी, श्री रमेश कुमार सिंह और श्री सुमन खड़का ने हिस्सा लिया, जबकि संचालन श्री गिरीश पीटर ने किया।

दुसाधी पकड़ी की ‘कूल रूफ’ पहल से मिली सीख

कार्यक्रम के अंतिम सत्र में गर्मी से बचाव के लिए स्थानीय प्रयोग के तौर पर दुसाधी पकड़ी गांव में चलाई गई ‘कूल रूफ’ (ठपनी छत) पहल के परिणामों पर चर्चा की गई। इसका केस प्रेजेंटेशन श्री प्रध्युम श्रेष्ठ ने दिया। इसमें श्री अमित कुमार, श्री अनुपम प्रियदर्शी, सुश्री रूबी रानी और श्री अमित के. सिंह ने अपने अनुभव साझा किए।

दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संवाद का समापन युगांतर के कार्यक्रम प्रबंधक श्री अभिषेक मिश्रा के सत्र के साथ हुआ। यह संवाद इस बात पर केंद्रित रहा कि नीतियों के क्रियान्वयन में आने वाली व्यावहारिक कमियों को दूर कर कैसे योजनाओं को अधिक समावेशी और जनोपयोगी बनाया जा सकता है।

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