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हाथियों की लड़ाई में घास कुचली जाती है!

प्राचीन काल की बात है, जब समाजवाद भारत के उस प्रान्त में चरम पर था जहाँ से कभी मगध साम्राज्य का शासन चलता था। उस दौर में देश के निशानों पर, चाहे अशोक स्तम्भ हो या ध्वज पर बना चिह्न, बिहार बाकी था, लेकिन, किन्तु, परन्तु, देश में बिहार के लोगों का योगदान फैक्ट्री में लोहा पीटने या खेतों में मजदूर जितना ही माना जाता था। यह अलग बात थी कि सड़क बनाने वाले श्रमिक ही नहीं, उनका नक्शा बनाने वाले अभियंताओं और उन नक्शों को पास करने वाले अफसरों में भी एक बड़ा वर्ग बिहारियों का ही था, क्योंकि मानना तो एक अलग बात होती है, और होना कोई दूसरी बात। मानना भावनाओं के आधार पर था, और होना तथ्यों पर आधारित होता है, और इसलिए इनमें काँच और पत्थर का-सा सम्बन्ध तो रहा ही है।

जो भी हो, सामाजिक न्याय को पीछे ठेलकर सुशासन में पहुँच चुके बिहार में अब सत्ता परिवर्तन की बारी थी। पुराने वाले राजा साहब की इच्छा थी कि उनके बाद उनका एकमात्र सुपुत्र ही गद्दी पर बैठे। भरत को खड़ाऊँ देकर शासन चलवाने के प्रयास में उनका हाथ वैसे ही जल चुका था जैसे होम करते हाथ जलता है। फिर उनसे पहले वाले राजा-रानी भी चाहते थे कि उनका पुत्र राजा बने, सो प्रतिस्पर्धा तो एक-दूसरे को विष देने तक थी ही। राजा के कमजोर पड़ते ही हर दौर में सामंतों की बन आती है, सो समय-समय पर उन्हें बूढ़ा मानने की गलती कर बैठे तीन-चार सामंतों को भी राजा साहब हाशिये पर ठेल चुके थे।
कुल मिलाकर राजनीति वैसे ही चल रही थी, जैसे चलनी चाहिए।

ऐसे माहौल में जब सत्ता परिवर्तन की माँगें उठने लगीं, पिछले वाले दौर का “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” युवाओं को याद आने लगा, तो राजा साहब का भी ध्यान अर्चना-उपासना आदि से हटकर अपने युवावस्था से तनिक आगे बढ़ चले पुत्र पर गया। खड़ाऊँ राजपाट के साथ देने की परंपरा का पालन करते हुए राजा साहब ने एक पक्ष बदलते रहने वाले सामंत के पुत्र को चुना। किसी दौर में स्वयं सामंत रहे राजा साहब ने सत्ता जिस परिवार से हथियाई थी, यह सामंत कभी उसी परिवार का विश्वासी रहा था। शक्ति जब एक हाथ से दूसरे हाथ गई तो भविष्य की संभावनाएँ कम होते देखकर सामंत दूसरे प्रत्याशियों से जा मिला था और अब उसका पुत्र राजा साहब के साथी सामंतों में ही शामिल था।

चुनाँचे राजा साहब को इस बार जब खड़ाऊँ रखकर सत्ता चलाने की ज़रूरत हुई तो जाँच में उसी सामंत पुत्र का नाम ऊपर आया। पूर्व में अपराधों के अभियोग थे, कुछ लोग बलात्कारी बताते थे, राजा से लड़ जाने का साहस दिखा चुका था, हारने पर पूरी बेशर्मी से पगड़ी-जूते का मोह छोड़कर राजा का साथ देने का वादा भी कर देता था, यानी राजनैतिक रूप से समझदार भी माना जा रहा था। चुनाव हुआ और सामंत पुत्र को गद्दी दे दी गई। अब प्रश्न था कि कहीं यह निकट भविष्य में राजा साहब के ही कम युवा पुत्र के लिए बड़ी चुनौती तो नहीं बन जाएगा? राजा के सामंतों को शक था कि जो पगड़ी-जूता पहनने-उतारने की राजनीति से बाज नहीं आता, वह चुनौती तो होगा ही, और ऐसा ही हुआ।

नए राजा ने आते ही पुराने राजा के धनबल पर नज़र डाली। चाणक्य के समय से लोग जानते हैं कि जैसे पानी में ही रहने वाली मछली कब एक-दो घूँट पानी पी गई, यह पता करना अत्यंत कठिन है, वैसे ही अधिकारी कब सरकारी करों में अपना हिस्सा बनाने लगें, यह जाँच भी मुश्किल है। इसे रोकने का एकमात्र उपाय त्वरित और कठोर दंड होता है। सो सामंत पुत्र नए राजा ने निशाना साधा। बिजली के मीटरों से जुड़े अधिकारियों पर गाज गिरी। फिर शिक्षा विभाग की बारी आई और साइकिल बाँटकर लड़कियों को शिक्षित करने वाले पुराने राजा के प्रिय अधिकारी नपने लगे। भू-राजस्व जैसे विभागों में बड़े पैमाने पर हेराफेरी शुरू हुई और जिन माध्यमों से धन कभी पुराने राजा साहब तक जाता था, वो नए सामंत पुत्र राजा के पास भेजना है, यह संदेश कर्मचारियों को दिया जाने लगा। पुराने राजा साहब के पुत्र को जो थोड़ी जगह मिली थी, वो स्वास्थ्य का विभाग अपने मंगलकाल से ही बीमार चल रहा था।

ऐसे में पुराने राजा साहब को “बालू” याद आया। सुशासन काल में ही कई पदार्थों को प्रतिबंधित करके सरकारी राजस्व को राजा साहब ठप्प कर चुके थे। इसने कई वैकल्पिक व्यवस्थाओं को जन्म दिया था। प्रतिबंधित पदार्थों की होम डिलीवरी में अब जो किशोर एवं युवा संलग्न थे, उन्हें बिना काम, कुछ सामान इधर-उधर पहुँचा देने के एवज में जो धन मिलने लगा था, उसका उपयोग भी अग्नेयास्त्रों से लेकर “सूखे” कहलाने वाले मादक पदार्थों में होता था। इकोसिस्टम में इन युवाओं को पकड़ने वाली पुलिस थी जो मुँह सूँघने के लिए कुख्यात हो चुकी थी। जब मामला थाने से नहीं सुलटता तो वकील आदि की भी आय का प्रबंध होता। पूरे प्रकरण में दलित समुदाय, जो इकोसिस्टम को खिलाने-पिलाने में आर्थिक रूप से सक्षम नहीं था, वह कारागार में पहुँच जाता। ऐसा ही मामला बालू का भी था।

बालू का व्यवसाय रुक नहीं सकता था क्योंकि भवन आदि का निर्माण कभी रुकता नहीं। खनन के लिए बँटवारे के बाद झारखंड से अलग हो चुके बिहार में पानी और बालू ही बचा था, जिस पर राजा साहब ने अपने लोगों को बिठा रखा था। सरकारी अधिकारियों की जो ठसक आम आदमी पर दिखती थी, वो बालू से जुड़े लोग जूतों से सुधार देने में समर्थ थे। चुनाँचे कागजी खानापूर्ति करके भोजपुर आदि क्षेत्रों के सरकारी कर्मचारी भी दशकों से अवैध खनन पर चुप ही रहते थे। मगर गंगा आदि नदियाँ कहाँ सुनती हैं? हजारों वर्षों से प्रकृति प्रदत्त सामर्थ्य को संभाल रही नदियों का ध्यान राजा साहब की चार दिन की चाँदनी में यत्र-तत्र बालू खोदने पर गया तो नदियों ने अपनी धारा बदली थी और पूरे-पूरे गाँव की जवनिया बहा ले गई थी। राजा साहब को पता था कि गाँव की जवनिया भले बह गई हो, लेकिन गाँव के युवा वर्ग की जवनिया तो अभी बाकी थी! नए सामंत पुत्र राजा की छवि पर प्रहार करने के लिए इससे अच्छा अवसर कहाँ मिलता?

बाढ़ राहत से जुड़े मुद्दों पर बहसें शुरू हुईं, फिर एक दिन एक नौजवान तमंचा लहराता कई वीडियो में दिखाई दिया। मुँह सूँघने और ट्रैफिक चालान काटने भर की आदी पुलिस को कमजोर बताया गया। तमंचा लहराने वाले की जाति भी ऐसी चुनी गई जिसे गालियाँ दिए बिना कोई समाजवादी नेता, नेता ही नहीं बनता। एक-दो दिन में ही माहौल बन गया। पुलिस की गोलियों ने खून के साथ युवक की जवनिया खेतों में बहा दी। नए सामंत पुत्र राजा और उसके समर्थकों ने पुलिस की कार्रवाई को शौर्य घोषित करते हुए अपनी पीठ थपथपानी शुरू ही की थी कि राजा साहब ने अगला मोहरा आगे बढ़ा दिया। पुलिस कार्रवाई की पोल खुलने लगी। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का बदला जाना उजागर होने लगा।

मारने वाले पुलिसकर्मियों पर ऐसे ही पुराने मुकदमे, जिनमें लोगों को गोली मारी गई थी, वो सामने आने लगे। अधिकारियों का बालू लूट में योगदान खुलने लगा और नए सामंत पुत्र राजा की अच्छे प्रशासक की छवि, जो कभी बनी ही नहीं थी, वो बिगड़ने लगी। इसी बीच राजा साहब के पुत्र को जो बीमार मंत्रालय मिला था, उसमें सुधार के कार्यों के लिए पुराने राजा के पुत्र के सुशासनी प्रयासों की चारों ओर प्रशंसा के स्वर भी सुनाई देने लगे। राजा साहब का काम बनने लगा था, पुत्र के लिए राजमहल का रास्ता साफ हो रहा था। उनसे पहले वाले राजा-रानी के परिवार को उनके गोल-चक्कर वाले मार्ग के महल से गोल-चक्कर मार्ग के रास्ते ही खदेड़ दिया गया था।

बाकी गिद्धों का काम ही है शवों को खाकर समाज को सड़ने वाली चीजों की बू-बैक्टीरिया आदि से बचाना। तो जिस नौजवान की जवनिया खेतों में बहा दी गई थी, उसके लिए क्या पक्ष और क्या विपक्ष? उसके शव पर “महाभोज” करने झुंड के झुंड गिद्ध रोज टूट कर गिरते थे। सामंत पुत्र से सत्ता वापस लेकर अपने पुत्र को देने की हाथियों की लड़ाई जारी थी, और हाथियों की लड़ाई में घास तो कुचली ही जाती है!

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