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सहरसा नगर निगम का अद्भुत ‘इंजीनियरिंग खेल’: टेंडर की पारदर्शी प्रक्रिया से बचने के लिए एक ही पोखर के जीर्णोद्धार कार्य को 11 छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा।
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मूल काम (उड़ाही) गायब, डेढ़ करोड़ की लागत से पोखर के चारों तरफ चमचमाते टाइल्स और ग्रिल लगाने की मची होड़।
सहरसा, अमन झा: बिहार में जब हम विकास और सुशासन पर विमर्श करते हैं, तो अक्सर हमारी फाइलें और प्रशासनिक आंकड़े बहुत खूबसूरत नजर आते हैं। लेकिन जब जमीनी हकीकत पर मानसून की बारिश थोड़ी देर से बरसती है, तो भ्रष्टाचार की जो गाद निकलती है, वह यह बताने के लिए काफी है कि हमारा सिस्टम किस कदर अंदर से खोखला हो चुका है। सहरसा के न्यू कॉलोनी वार्ड 13 से आई ये खबर बिहार के नगर निकायों में चल रहे ‘लूट-तंत्र’ का एक जीता-जागता और प्रामाणिक दस्तावेज है।
🛑 एनजीटी (NGT) के डंडे से जागा प्रशासन, पर नीति में खोट
मामला सहरसा शहर के न्यू कॉलोनी वार्ड 13 स्थित एक ऐतिहासिक पोखर का है, जो वर्षों से उपेक्षित और प्रदूषित था। जब राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) ने इस पर कड़ा संज्ञान लिया, तो नगर निगम ने आनन-फानन में इसके जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण का काम शुरू किया। इस पूरे प्रोजेक्ट का बजट 1.5 करोड़ रुपये से अधिक निर्धारित किया गया।
नियम कहता है कि 15 लाख रुपये से अधिक के किसी भी सरकारी काम के लिए बकायदा पारदर्शी ई-टेंडर (E-Tender) निकाला जाना अनिवार्य है, ताकि सही और योग्य ठेकेदार को काम मिले और सरकारी धन का दुरुपयोग न हो। लेकिन सहरसा नगर निगम के चतुर अधिकारियों और इंजीनियरों ने टेंडर की इस झंझट और पारदर्शिता से बचने के लिए एक ऐसा नायाब तरीका निकाला, जो बिहार के प्रशासनिक भ्रष्टाचार के इतिहास में दर्ज होना चाहिए। उन्होंने डेढ़ करोड़ के इस पूरे काम को 11 छोटे-छोटे खंडों (टुकड़ों) में बांट दिया, ताकि हर काम 15 लाख की सीमा से नीचे रहे और इसे ‘विभागीय स्तर’ पर अपने चहेते ठेकेदारों में चुपचाप बांट दिया जाए।
📋 ‘भ्रष्टाचार का फ्लोचार्ट’: एक पोखर, 11 हिस्से
इस खेल की पूरी क्रोनोलॉजी समझते हैं। एक ही पोखर के काम को इस तरह तोड़ा गया:
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मध्य उत्तर-पश्चिमी भाग, मध्य पश्चिमी भाग, दक्षिणी-पश्चिमी भाग, उत्तर-पूर्वी भाग, मध्य-पूर्वी भाग, दक्षिण-पूर्वी भाग और उत्तर-पश्चिमी भाग की सीढ़ियों के जीर्णोद्धार को अलग-अलग 7 टुकड़ों में बांटा गया।
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इसके बाद पोखर के उत्तर-पूर्व, दक्षिण-पूर्व, दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पश्चिम हिस्सों में ‘ग्रिल से घेराव’ के काम को 4 अलग टुकड़ों में बांट दिया गया।
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स्थिति यह हो गई कि एक सीढ़ी के लिए सात लोग और ग्रिल लगाने के लिए चार लोगों में पूरा ठेका बांट दिया गया।
🌊 मानसून ने फेरा ‘भ्रष्टाचार की प्लानिंग’ पर पानी
इस पूरे घोटाले की टाइमिंग भी बेहद दिलचस्प थी। अधिकारियों और ठेकेदारों को पूरी उम्मीद थी कि जून महीने में मानसूनी बारिश शुरू हो जाएगी। जैसे ही मूसलाधार बारिश होती, यह पूरा पोखर पानी से लबालब भर जाता। पानी भरने के बाद जनता को कभी पता ही नहीं चलता कि पोखर के नीचे जमी हुई शौचालय और सीवर की गाद (कचरा) को साफ़ किया गया है या नहीं।
लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। इस बार मानसून आने में देरी हो गई और पोखर के बीच फैली हरी गाद और गंदगी धूप में चिल्ला-चिल्लाकर भ्रष्टाचार की गवाही देने लगी।
🧱 बिना उड़ाही के टाइल्स और 3 नंबर ईंटों का खेल
चूंकि कागजों पर पैसा बहाना था, इसलिए बिना पोखर की गहराई तक जाकर उसकी उड़ाही (सफाई) किए ही, चारों तरफ आनन-फानन में सीढ़ियां खड़ी कर दी गईं और उन पर टाइल्स बैठा दिए गए। अब हालत यह है कि पोखर के चारों तरफ सीढ़ियां और ग्रिल इस तरह ब्लॉक हो चुके हैं कि उड़ाही के लिए कोई मशीन अंदर जा ही नहीं सकती।
इतना ही नहीं, सौंदर्यीकरण के नाम पर पोखर के किनारे 3 नंबर (घटिया दर्जे की) ईंटों से सोलिंग की जा रही है और पुरानी सीढ़ियों पर ही एक-दो नई ईंटें जोड़कर निम्न स्तरीय टाइल्स चिपकाए जा रहे हैं। आश्चर्य की बात यह है कि साइट पर नियमानुसार कोई ‘सूचना बोर्ड’ भी नहीं लगाया गया है, ताकि जनता को भनक तक न लगे कि कौन सा काम किस फंड से और कौन ठेकेदार कर रहा है।
💬 विकास या केवल कागजी लिपापोती?
इस पूरे मामले पर ठेकेदार सह सह-प्रबंधक अभिसार कुमार का कहना है कि काम 15 दिनों में पूरा हो जाएगा और सिटिंग बेंच, रोशनी तथा मिट्टी उड़ाही का काम अभी बाकी है। लेकिन 8 जुलाई को कोलकाता एनजीटी (NGT) में इस मामले की सुनवाई होनी है, जिससे पहले कागजी कोरम पूरा करने की होड़ मची है।
सीधा सवाल यह है: क्या एनजीटी और कोर्ट के आदेशों का पालन केवल फाइलों को चमकाने और टाइल्स लगाने के लिए होता है? जिस पोखर का मूल उद्देश्य जल संचयन और पर्यावरण संतुलन था, उसकी गंदगी को साफ किए बिना उसके चारों तरफ डेढ़ करोड़ के टाइल्स लगा देना जनता के पैसे की खुली डकैती नहीं तो और क्या है? जब तक बिहार के नगर निकायों में टेंडर से बचने के लिए ‘टुकड़े-टुकड़े’ में काम बांटने के इस खेल पर कड़ा प्रहार नहीं होगा, तब तक स्मार्ट सिटी और सौंदर्यीकरण के नाम पर जनता का पैसा इसी तरह गाद के ऊपर टाइल्स बिछाने में बहता रहेगा।
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