-
छपरा के डीपीओ अजीत कुमार हरिजन पर कसा शिकंजा, 32 महीने की नौकरी में पत्नी के नाम खरीदी 120 कट्ठा जमीन।
-
वेंडर से घूस लेने के मामले में डीडीसी की जांच रिपोर्ट ने खोला ‘काली कमाई’ का कच्चा चिट्ठा; वास्तविक अवैध कमाई 3 करोड़ से ऊपर होने का अनुमान।
छपरा/पटना, बिहार विमर्श: बिहार में जब भी सुशासन, सरकारी नियंत्रण और कड़े नियमों की दुहाई दी जाती है, तो उसके पीछे का असली मकसद कई बार केवल ‘लाइसेंस राज’ और ‘कमीशनखोरी’ के नए रास्ते खोलना होता है। छपरा (सारण) से आई यह खबर उन लोगों की आंखें खोलने के लिए काफी है जो यह मानते हैं कि सरकारी विभागों का नियंत्रण बढ़ाने से समाज का कल्याण होता है। यथार्थ यह है कि जहाँ-जहाँ जनता के टैक्स का पैसा और प्रशासनिक अधिकार सरकारी बाबू के हाथ में केंद्रित होते हैं, वहाँ ‘अजीत कुमार’ जैसे चेहरे करोड़ों की लूट की नई गाथाएं लिखते हैं।
🛑 32 महीने की सेवा और करोड़ों का हेरफेर: पूरा मामला क्या है?
मामला छपरा के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (DPO) माध्यमिक शिक्षा, अजीत कुमार हरिजन का है। एक वेंडर (शिक्षा विभाग के संवेदक रवि कुमार राम) से 12.50 लाख रुपये की रिश्वत लेने के आरोप के बाद उपविकास आयुक्त (DDC) के नेतृत्व में पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच टीम का गठन किया गया था। जांच समिति में वरीय कोषागार पदाधिकारी, डीएसपी (मुख्यालय) और कार्यपालक अभियंता (एलएईओ-1) शामिल थे।
जब इस जांच टीम ने डीपीओ के बैंक स्टेटमेंट्स और संपत्तियों की खंगाली की, तो जो आंकड़े सामने आए, वे होश उड़ाने वाले हैं:
-
वेतन बनाम लेनदेन: 32 महीनों की सेवा अवधि के दौरान डीपीओ को कुल वेतन के रूप में लगभग 27.43 लाख रुपये (27,43,040 रुपये) मिलने चाहिए थे। लेकिन इसी अवधि में उनके और उनकी पत्नी के बैंक खातों में 2.51 करोड़ रुपये (2,51,06,562 रुपये) से अधिक का संदिग्ध लेनदेन और जमा राशि पाई गई।
-
पत्नी के नाम अकूत जमीन: इतनी कम सेवा अवधि में डीपीओ ने अपनी पत्नी पूजा कुमारी के नाम पर एकमा प्रखंड में लगभग 6 बीघा 9 कट्ठा 8 धुर (करीब 120 कट्ठा) जमीन मात्र 41.50 लाख रुपये की ऑन-पेपर लागत से खरीद डाली। इसके अलावा करोड़ों की लागत से मकान बनाने और अन्य संपत्तियों के भी प्रमाण मिले हैं।
📜 सेवा नियमावली की धज्जियां और ‘कमीशन’ का खेल
जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि डीपीओ यह भली-भांति जानते थे कि शिकायतकर्ता विभाग का ठेकेदार (संवेदक) है। इसके बावजूद उनके बीच हुआ यह वित्तीय लेनदेन ‘बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम-14’ का खुला उल्लंघन है। नियम के मुताबिक कोई भी सरकारी कर्मचारी सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना अपने या परिवार के माध्यम से कोई उपहार या आर्थिक लाभ स्वीकार नहीं कर सकता। लेकिन जहाँ नीयत ही खोट से भरी हो, वहाँ नियम केवल फाइलों की शोभा बढ़ाते हैं। अधिकारियों का अनुमान है कि इनकी वास्तविक अवैध कमाई 3 करोड़ रुपये से कहीं अधिक हो सकती है।
💡 आर्थिक विमर्श: असली कोढ़ कहाँ है?
यह मामला केवल एक व्यक्तिगत भ्रष्टाचार का नहीं है, बल्कि यह उस ‘सिस्टम’ का परिणाम है जिसके खिलाफ हम अक्सर लिखते रहे हैं:
-
‘लाइसेंस-परमिट राज’ का नतीजा: जब तक वेंडर, ठेकेदार, स्कूल और अस्पताल किसी एक ‘सरकारी बाबू’ के दस्तखत और उसकी मर्जी पर निर्भर रहेंगे, तब तक भ्रष्टाचार बंद नहीं हो सकता। यह ‘डीपीओ’ साहब बच्चों की शिक्षा सुधारने के लिए नहीं, बल्कि विभाग में आने वाले फंड और वेंडरों के बिल पास करने के बदले ‘कमीशन’ वसूलने के लिए अपनी शक्ति का इस्तेमाल कर रहे थे।
-
समाजवाद की आड़ में सामंती लूट: जो लोग श्मशान, अस्पताल या स्कूलों के सरकारी नियंत्रण की वकालत करते हैं, वे भूल जाते हैं कि सरकारी नियंत्रण का सीधा मतलब ‘बाबूशाही का एकाधिकार’ होता है। 27 लाख रुपये का वैध वेतन पाने वाला अधिकारी जब 32 महीनों में ढाई करोड़ से ज्यादा का मालिक बन बैठता है, तो वह असल में जनता और राज्य के विकास की चोरी कर रहा होता है।
-
पारदर्शिता की कमी: बैंक खातों की जांच तो तब हुई जब किसी ने हिम्मत दिखाकर शिकायत दर्ज कराई। न जाने ऐसे कितने ही ‘महिमामंडित क्लर्क और अधिकारी’ राज्य की छाती पर बैठकर हर रोज़ ऐसी ही उगाही कर रहे हैं।
📌 आगे की कार्रवाई और जनता का सवाल
जांच समिति ने इस मामले को पहली नज़र में ही ‘आय से अधिक संपत्ति’ का गंभीर मामला माना है और डीपीओ, उनकी पत्नी व परिवार के अन्य सदस्यों के सभी बैंक खातों तथा अवर निबंधन पदाधिकारी से उनकी संपत्तियों की विस्तृत जांच कराने की मजबूत अनुशंसा की है।
परंतु बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल जांच बैठ जाने से या सस्पेंशन हो जाने से यह बीमारी रुक जाएगी? जब तक हम इस देश में ‘प्रशासनिक जवाबदेही’ (Administrative Accountability) और ‘व्यावसायिक स्वतंत्रता’ को लागू नहीं करेंगे, तब तक सरकारी विभागों की कुर्सियों पर बैठे ऐसे लुच्चे और धूर्त लोग जनता के पैसे पर अपनी पत्नियों और रिश्तेदारों के नाम महल और जागीरें खड़े करते रहेंगे।
अब समय आ गया है कि जनता केवल जांच रिपोर्ट न देखे, बल्कि इस पूरे ‘कंट्रोल सिस्टम’ को बदलने के लिए अपनी आवाज़ बुलंद करे!
#BiharVimars #ChhapraNews #CorruptionInBihar #SarkariLoot #DPOBihar #SaranNews #AdministrativeFailure #IncomeDisproportionate