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हिमालय के अस्थिर भूगोल से बढ़ता सैलाब का खतरा: नेपाल की आपदा और बिहार के लिए खतरे की घंटी

जल विशेषज्ञ दिनेश मिश्र के विश्लेषण के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक अस्थिरता और जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव बिहार की नदियों और यहाँ के मैदानी इलाकों पर पड़ रहा है। नेपाल में हाल ही में आई तबाही से भारत, विशेषकर बिहार का अछूता रहना बेहद मुश्किल है। नेपाल से बहकर आने वाला जल गंडक नदी के रास्ते भारत में प्रवेश कर चुका है।

गंडक नदी और वाल्मीकिनगर बैराज की स्थिति

नेपाल से बहने वाला पानी पश्चिमी चंपारण के रास्ते बिहार में प्रवेश करता है। 1960 के दशक में गंडक नदी पर उत्तर प्रदेश और बिहार के खेतों की सिंचाई के उद्देश्य से दोनों ओर तटबंध और एक बैराज बनाया गया था।

  • बैराज का ढाँचा: 36 फाटकों वाले इस बैराज का आधा हिस्सा (18 फाटक) भारत में और आधा हिस्सा (18 फाटक) नेपाल में पड़ता है।

  • वर्तमान स्थिति: पश्चिमी चंपारण पहुँचने पर नदी के पश्चिमी किनारे पर उत्तर प्रदेश पड़ता है। फिलहाल नदी में जलस्तर नियंत्रण में है, लेकिन यदि नेपाल के ऊपरी हिस्सों से पानी की आवक (आवास/इनफ्लो) तेजी से बढ़ती है, तो गंडक के दोनों तटवर्ती क्षेत्रों में भीषण बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है।

नेपाल में तबाही की वजह: कृत्रिम झील का टूटना

नेपाल में हाल ही में आया सैलाब हिमस्खलन के कारण बनी अस्थाई कृत्रिम झील के फटने से आया था:

  • घटनाक्रम: लांगटांग लिरंग पर एक विनाशकारी हिमस्खलन ने नेपाल-तिब्बत सीमा पर मानसून के पानी से उफनती ‘लेंदे खोला’ (हिमालयी नदी) के बहाव को रोक दिया।

  • मलबे की बाढ़: इस मलबे से बनी अस्थाई झील के किनारे जल्द ही टूट गए, जिससे भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में भारी मात्रा में मिट्टी, पत्थर और मलबे का प्रवाह शुरू हो गया।

  • प्रभाव: मलबे की इस बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट और धाडिंग जिलों में तबाही मचाई, कई गाँव मलबे की मोटी परत में दफन हो गए और बुनियादी ढाँचा पूरी तरह जमींदोज हो गया।

ऐतिहासिक चेतावनी और बार-बार दोहराता पैटर्न

हिमालयी क्षेत्र में अस्थाई झीलों का बनना और टूटना कोई नई बात नहीं है। यह ऐतिहासिक और भू-वैज्ञानिक पैटर्न का हिस्सा रहा है:

  • ऐतिहासिक संदर्भ (1255 और 1564 ई.): 1255 ईस्वी में 7.8 तीव्रता के भूकंप के बाद अन्नपूर्णा शिखर की ढलान से विशाल चट्टान टूटकर गिरी थी, जिससे नदियों का रास्ता अवरुद्ध हुआ था। इसी तरह 1564 में पोखरा के उत्तर में माछापुच्छ्रे शिखर से भारी मलबा घाटी में बहकर आया था।

  • 1985 (दिग्त्शो ग्लेशियर): दिग्त्शो ग्लेशियर झील के मोरेन बांध के टूटने से भारी तबाही हुई थी।

  • 2012 (सेती नदी): माछापुच्छ्रे की ढलानों पर अचानक झरने और बर्फ पिघलने से पोखरा के इलाकों में तबाही आई थी।

  • 2013 एवं 2014: 2013 में उत्तराखंड की चोराबारी झील का टूटना और 2014 में सुनकोशी नदी के बहाव का भूस्खलन से रुक जाना।

  • हालिया घटनाएँ (2017, 2021, 2023, 2025): वरुणा घाटी से लेकर भारतीय हिमालयी क्षेत्रों में टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल और चट्टानों के टूटने से बार-बार ऐसी घटनाएँ दोहराई जा रही हैं।

बिहार के लिए सबक

इन तमाम घटनाओं से सबसे बड़ा सबक यह है कि हमें हिमालयी क्षेत्र और इसके निचले मैदानी क्षेत्रों में बसे मानव समाज के संबंधों पर नए सिरे से विचार करना होगा।

  • विस्मृति की प्रवृत्ति: हर बड़ी आपदा के बाद हम उसे सामाजिक स्तर पर भूल जाते हैं, जिससे नीति-निर्माताओं और विकास परियोजनाओं में जुटे संस्थानों को चेतावनी के संकेतों को नजरअंदाज करने का मौका मिल जाता है।

  • पुनर्विचार की आवश्यकता: नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में आने वाली हर प्राकृतिक आपदा बिहार के लिए सीधी चेतावनी है। समय रहते पूर्व-तैयारी, वैज्ञानिक अध्ययन और पर्यावरण-संवेदी विकास नीतियों पर गंभीरता से काम करने की सख्त जरूरत है।

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