इंडिया पॉलिसी फोरम (IPF 2026) के शोध पत्र के संदर्भ में बिहार विमर्श का विस्तृत विश्लेषण
मूल शोध पत्र: Macro Perspective of Bihar’s Development: Achievements, Unfinished Agenda, and the Way Forward
लेखक: रत्ना सहाय (NCAER), संतोष गौतम (University of Notre Dame, IZA@LISER), निशीथ प्रकाश (Northeastern University, BREAD, IZA@LISER, CESifo, CReAM), और आकाश देव (NCAER)
प्रकाशन/संगोष्ठी: नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER), इंडिया पॉलिसी फोरम, 6–8 अगस्त 2026, नई दिल्ली
1. प्रस्तावना: ‘विकसित भारत @2047’ और बिहार की केंद्रीय भूमिका
भारत के प्रधानमंत्री द्वारा प्रस्तुत ‘विकसित भारत @2047’—वर्ष 2047 तक भारत को एक पूर्ण विकसित अर्थव्यवस्था बनाने का दृष्टिकोण—तब तक अपनी पूर्ण सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता जब तक कि बिहार तीव्र, समावेशी, टिकाऊ और उच्च विकास दर हासिल न करे। बिहार भारत का दूसरा सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य है, जिसकी आबादी वर्ष 2026 में 13.2 करोड़ (132 मिलियन) तक पहुँचने का अनुमान है, जो भारत की कुल जनसंख्या का 9 प्रतिशत से अधिक है। वैश्विक धरातल पर देखें तो बिहार की जनसंख्या दुनिया के केवल दस सम्प्रभु देशों (चीन, अमेरिका, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, नाइजीरिया, ब्राजील, बांग्लादेश, रूस, इथियोपिया और मैक्सिको) को छोड़कर शेष सभी देशों से अधिक है। इस कारण बिहार की आर्थिक स्थिति न केवल भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास का दिशा-निर्धारण करती है, बल्कि यह संपूर्ण विश्व की आबादी के एक बड़े हिस्से के जीवन-स्तर को प्रभावित करती है।
बिहार की वर्तमान स्थिति में विरोधाभास और अपार संभावनाएँ दोनों निहित हैं। एक ओर, बिहार भारत का सबसे गरीब राज्य बना हुआ है, जहाँ प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत के मात्र एक-तिहाई के बराबर है और कई सामाजिक-आर्थिक संकेतकों में यह अन्य राज्यों से पीछे है। दूसरी ओर, वर्ष 2005 के बाद सुधारवादी सरकार के आगमन के साथ राज्य ने लगभग दो अंकों (double-digit) की दशक-स्तरीय संवृद्धि दर दर्ज की, जो इसकी विकास क्षमता को प्रमाणित करती है। बिहार के पास एक अत्यधिक युवा और आकांक्षी जनसांख्यिकी है। यद्यपि यह मुख्य रूप से एक ग्रामीण व कृषि-प्रधान समाज है, इसकी भूमि अत्यंत उपजाऊ है और गंगा नदी के जल संसाधनों से समृद्ध है। इन संसाधनों का समुचित उपयोग करके कृषि उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है, विनिर्माण (manufacturing) और सेवा क्षेत्र (services sector) के लिए श्रम जारी किया जा सकता है, और स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सकती है।
सामाजिक दृष्टि से बिहार एक अत्यधिक स्तरीकृत समाज रहा है, जहाँ जाति और वर्ग के विभाजन बहुत गहरे हैं। राज्य में 214 जातियां सूचीबद्ध हैं, जिनमें बड़ा हिस्सा निचली जातियों का है—पिछड़ा वर्ग (27%), अत्यंत पिछड़ा वर्ग (36%), तथा अनुसूचित जाति और जनजाति (लगभग 21%)। आर्थिक वर्ग और सामाजिक वर्ग में सीधा संबंध रहा है; उच्च जातियों के पास व्यापक भूमि जोत रही है और उनकी आय निचली जातियों की तुलना में कई गुना अधिक रही है। इस सामाजिक और आर्थिक विषमता ने ऐतिहासिक रूप से वर्ग व जातीय संघर्षों को जन्म दिया। राजनीति में जाति के दबदबे ने नीति-निर्माण को जटिल बनाया है, क्योंकि विभिन्न जाति समूहों की प्राथमिकताएं भिन्न थीं और स्थानीय राजनीति पर हावी उच्च जातियों के निहित स्वार्थ गहराई से जमे हुए थे।
बिहार के इस विकास पथ, ऐतिहासिक कारणों, 2005 के बाद हुए परिवर्तनों और भविष्य के नीतिगत खाके को समझने के लिए NCAER के ‘इंडिया पॉलिसी फोरम 2026’ में प्रस्तुत रत्ना सहाय, संतोष गौतम, निशीथ प्रकाश और आकाश देव का शोध पत्र एक अत्यंत प्रामाणिक और व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है।
2. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: समृद्ध अतीत से आर्थिक पतन की गाथा
बिहार के वर्तमान पिछड़ेपन को समझने के लिए इसके सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक इतिहास का विश्लेषण करना आवश्यक है।
(क) प्राचीन एवं मध्यकालीन स्वर्णिम युग
ऐतिहासिक रूप से बिहार भारत के राजनीतिक, बौद्धिक और आर्थिक जीवन का केंद्र बिंदु था। नंद (345 ईसा पूर्व–322 ईसा पूर्व), मौर्य (321 ईसा पूर्व–185 ईसा पूर्व) और गुप्त (240 ईस्वी–550 ईस्वी) राजवंशों ने पाटलिपुत्र से एक एकीकृत और अत्यंत सफल साम्राज्य का संचालन किया। वे उत्कृष्ट प्रशासनिक व्यवस्था, सामाजिक सेवाओं और भौतिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण के अग्रदूत थे। नालंदा और विक्रमशिला जैसे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिक्षा केंद्र बिहार में स्थित थे, जहाँ से बौद्ध धर्म और दर्शन का प्रसार दुनिया भर में हुआ। कौटिल्य द्वारा रचित लोक-प्रशासन व अर्थशास्त्र का महान ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ पहली बार बिहार की धरती पर ही लागू किया गया था। 20वीं सदी में भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद (स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति) और जयप्रकाश नारायण (1970 के दशक में भ्रष्टाचार व अधिनायकवाद के विरुद्ध संघर्ष करने वाले नेता) जैसी हस्तियां बिहार से ही उभरीं। महात्मा गांधी ने भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपने पहले सत्याग्रह की शुरुआत बिहार के चंपारण जिले से की थी।
(ख) ब्रिटिश शासन के दौरान पतन
1947 में स्वतंत्रता के समय बिहार की प्रारंभिक स्थिति अत्यंत दयनीय थी। ब्रिटिश काल में बिहार की विशाल कृषि-आधारित आबादी के जीवन-स्तर में लगातार गिरावट दर्ज की गई:
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1793 का स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement): ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा लागू इस प्रणाली ने ज़मींदारों को भू-राजस्व के बदले भूमि पर वंशानुगत अधिकार दे दिए, जिनका कर निर्धारण निश्चित था और कृषि उपज से असंबद्ध था। ज़मींदारों ने बटाईदारों और भूमिहीन किसानों का अत्यधिक शोषण किया। इस मध्यस्थ व्यवस्था ने कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए भूमि में निवेश के प्रोत्साहन को समाप्त कर दिया और अनुपस्थित भू-स्वामित्व (absentee landlordism) व जातिगत विषमता को बढ़ावा दिया। ब्रिटिश शासन द्वारा सार्वजनिक प्रशासन, स्वास्थ्य और शिक्षा पर आवंटन बिहार और उड़ीसा में भारत में सबसे कम था।
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औपनिवेशिक वि-औद्योगीकरण (De-industrialisation): औपनिवेशिक काल से पूर्व पूर्वी भारत (जिसमें बिहार शामिल था) की ग्रामीण अर्थव्यवस्था विविधतापूर्ण थी, जहाँ हस्तशिल्प, हाथकरघा बुनाई और कताई कृषि की पूरक आय के रूप में कार्य करते थे। 19वीं सदी में ब्रिटेन के मशीनीकृत वस्त्र उद्योग और औपनिवेशिक व्यापार नीतियों ने भारत में सस्ते ब्रिटेन निर्मित सामानों को भर दिया। इससे पारंपरिक कारीगर विस्थापित हो गए और उन्हें वापस कृषि पर निर्भर होना पड़ा, जिससे भूमि पर दबाव बढ़ा और ग्रामीण उत्पादकता में दीर्घकालिक गिरावट आई।
(ग) स्वतंत्रता के बाद की नीतियाँ और ‘बीमारू’ (BIMARU) राज्य का दौर
स्वतंत्रता के बाद आधी सदी से अधिक समय तक बिहार संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद आर्थिक रूप से पिछड़ा रहा:
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भूमि सुधारों की विफलता: बिहार भूमि सुधार अधिनियम (1950) और सीलिंग अधिनियम (1961, 1973) का कार्यान्वयन अत्यंत लचर रहा। बड़े भू-स्वामियों ने ‘बेनामी’ हस्तांतरणों के माध्यम से सीलिंग कानूनों को बेअसर कर दिया। बटाईदारों (sharecroppers) को कानूनी अधिकार न मिलने से भूमि में निवेश रुका और पारिवारिक विभाजन के कारण जोतों का आकार छोटा (fragmented) होता चला गया।
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हरित क्रांति से वंचना: 1960 के दशक की हरित क्रांति (उन्नत बीज, उर्वरक, आधुनिक तकनीक) का लाभ पंजाब और हरियाणा की तरह बिहार को नहीं मिला। आज भी बिहार का केवल 60 प्रतिशत सकल फसल क्षेत्र ही सिंचित है।
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भाड़ा समानीकरण नीति (Freight Equalization Policy 1952–1993): केंद्र सरकार की इस नीति ने देश भर में खनिजों व कच्चे माल के परिवहन लागत को समान कर दिया। इसके कारण कारखाने कच्चे माल के स्रोत (बिहार) के पास लगाने के बजाय महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे तटीय राज्यों में स्थापित हुए जहाँ बुनियादी ढाँचा और बंदरगाह बेहतर थे। इससे बिहार का औद्योगीकरण ठप हो गया।
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1990 का दशक और शासन तंत्र का पतन: 1991 के राष्ट्रीय आर्थिक उदारीकरण का लाभ बिहार नहीं उठा सका। 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली जनता दल (JD) सरकार ने पिछड़ी जातियों को सामाजिक प्रतिष्ठा और अधिकार (dignity) तो प्रदान किए, लेकिन विकास एजेंडे को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। योग्यता-आधारित भर्तियों को रोककर सरकारी पद खाली छोड़ दिए गए। इस काल में कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई—अपहरण, हत्या, डकैती, रंगदारी और चारा घोटाला जैसे व्यापक भ्रष्टाचार के मामलों ने राज्य की साख को भारी चोट पहुँचाई। बुनियादी ढाँचा, स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र ध्वस्त हो गए। इसी दौर में जनसांख्यिकीविद आशीष बोस ने बिहार को उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के साथ “बीमारू” (BIMARU) राज्य का नाम दिया।
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वर्ष 2000 का विभाजन (Bifurcation): 2000 में बिहार को विभाजित कर झारखंड का गठन किया गया। विभाजन अत्यधिक असममित था: बिहार को केवल 25% भौतिक व औद्योगिक संपत्तियां मिलीं, जबकि 75% जनसंख्या और वित्तीय देनदारियाँ बिहार के पास रह गईं। इसके अतिरिक्त, विभाजन के बाद शेष बिहार का 73 प्रतिशत भूभाग बाढ़ और सुखाड़ के प्रति संवेदनशील हो गया, जिससे प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम अत्यधिक बढ़ गया।
3. 2005 के बाद का ऐतिहासिक कायाकल्प (The Post-2005 Turnaround)
नवंबर 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए (NDA) सरकार के सत्ता में आने के बाद प्रशासनिक सुधारों और बुनियादी ढाँचे के विकास का एक नया दौर शुरू हुआ।
बिहार का ऐतिहासिक विकास क्रम:
[प्राचीन स्वर्णिम काल] ──► [औपनिवेशिक शोषण (1793)] ──► [1952 भाड़ा समानीकरण व उदारीकरण की विफलता]
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[2005 के बाद सुशासन व विकास] ◄── [2000 झारखंड विभाजन] ◄── [1990 का दशक: बीमारू दौर]
(क) आर्थिक वृद्धि, प्रति व्यक्ति आय और गरीबी में कमी
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संवृद्धि दर में उछाल: वर्ष 1991–2005 के बीच बिहार की वास्तविक जीएसडीपी (GSDP) संवृद्धि दर मात्र 3.3 प्रतिशत वार्षिक थी (भारत: 5.6%), जो 2006–2023 के दौरान बढ़कर 7.3 प्रतिशत वार्षिक हो गई, जो भारत की औसत दर (6.1%) से भी अधिक थी।
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प्रति व्यक्ति आय: पूर्व-2005 काल में प्रति व्यक्ति GSDP वृद्धि दर मात्र 1 प्रतिशत पर ठप थी, जो 2006 के बाद बढ़कर 5.7 प्रतिशत वार्षिक हो गई। यह उपलब्धि उच्च प्रजनन दर (TFR 3.6) के बावजूद हासिल की गई।
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संरचनात्मक बदलाव (Structural Transformation): राज्य के सकल मूल्य संवर्धन (GSVA) में कृषि की हिस्सेदारी 1991–2005 के 40% से घटकर 2006–2023 में 24% से कम रह गई। इसके विपरीत, सेवा क्षेत्र (Services Sector) का हिस्सा बढ़कर 57% हो गया। हालाँकि, कृषि क्षेत्र आज भी राज्य के 54% कार्यबल को रोजगार देता है।
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बहुआयामी गरीबी (MPI) में गिरावट: नीति आयोग के राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार, बिहार में बहुआयामी गरीबी की दर NFHS-4 (2015-16) के 51.9% से गिरकर NFHS-5 (2019-21) में 33.8% रह गई। केवल पाँच वर्षों में 2.25 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले, जो बिहार की कुल आबादी का लगभग 20% है।
(ख) राज्य के लोक वित्त (Public Finances) में सुधार
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राजस्व संतुलन: 2001-2004 के दौरान औसतन -6.8% का राजकोषीय घाटा 2005-2019 के दौरान घटकर औसतन -2.7% पर आ गया। सबसे महत्त्वपूर्ण यह रहा कि 2005-2019 के दौरान बिहार ने अपने राजस्व खाते में अधिशेष (Revenue Surplus) दर्ज किया।
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कर राजस्व और विकास व्यय: राज्य की स्वयं की राजस्व प्राप्तियाँ 2004-05 के 5% से कम से बढ़कर 6-6.5% GSDP तक पहुँचीं। कुल व्यय में सामाजिक और आर्थिक सेवाओं (विकासमूलक व्यय) का हिस्सा 2001-02 के 60% से बढ़कर 2023-24 में लगभग 71% हो गया।
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ऋण-जीएसडीपी अनुपात: 1990 और 2000 के दशक की शुरुआत में ऋण का अनुपात 50% से अधिक था, जो 2019 तक घटकर 30% से नीचे आ गया।
(ग) भौतिक बुनियादी ढाँचे और जन-सुविधाओं का अभूतपूर्व विस्तार
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सड़क संपर्क: पथ निर्माण विभाग के तहत कुल सड़क नेटवर्क में 80% और राष्ट्रीय राजमार्गों में 70% से अधिक की वृद्धि हुई। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) के तहत ग्रामीण सड़कों का निर्माण दोगुना हुआ।
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बिजली क्षेत्र में क्रांति: बिजली वितरण में सकल तकनीकी व वाणिज्यिक (AT&C) नुकसान, जो 2005-06 में 84% था (अर्थात् 4/5 से अधिक बिजली चोरी या तकनीकी रूप से बर्बाद हो जाती थी), वह 2024-25 तक घटकर मात्र 15.5% रह गया। बिजली तक घरेलू पहुँच 1993 के 17% से बढ़कर 2021 में 95% से अधिक हो गई।
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पेयजल और स्वच्छता: ‘हर घर नल का जल’ और ‘जल जीवन मिशन’ के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में नल के पानी की पहुँच 2019 के 2% से कम से बढ़कर 2025 तक 95% से अधिक हो गई। स्वच्छ भारत मिशन के तहत 1.2 करोड़ से अधिक शौचालय बनाए गए, जिससे स्वच्छता पहुँच 47% तक पहुँची।
(घ) सामाजिक संकेतक और कानून-व्यवस्था
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अपराध दर में भारी गिरावट: स्पीडी ट्रायल (त्वरित सुनवाई) और विशेष अदालतों के गठन से अपराध पर लगाम लगी। 1990 के दशक के उत्तरार्ध में जहाँ प्रतिवर्ष 5,300 से अधिक हत्याएं होती थीं, वह 2024 में घटकर 1,165 रह गईं। डकैती के मामले 3,200 से घटकर 222 पर आ गए।
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शिक्षा और स्वास्थ्य: बालिकाओं के लिए मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना, मुफ्त पोशाक और छात्रवृत्ति योजनाओं से छात्राओं का माध्यमिक नामांकन बढ़ा। स्वास्थ्य क्षेत्र में संस्थागत प्रसव (Institutional Deliveries) बढ़कर 81.1% और पूर्ण टीकाकरण 71% हो गया।
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प्रवास और प्रेषित धन (Migration & Remittances): रोजगार के अवसरों की कमी के कारण बिहार से पुरुषों का बड़े पैमाने पर अंतरराज्यीय प्रवास (Inter-state migration) हुआ। 2014 से 2025 के बीच राज्य में आने वाला प्रेषित धन (remittances) वास्तविक रूप में चार गुना हो गया, जिसने घरेलू उपभोग और कल्याण को बड़ा संबल दिया।
4. गंभीर समष्टिगत चुनौतियाँ: तुलनात्मक समष्टिगत विश्लेषण
शोध पत्र इस बात पर विशेष बल देता है कि 2005 के बाद की प्रगति के बावजूद बिहार की अन्य राज्यों से तुलना करने पर कई संरचनात्मक कमजोरियाँ उजागर होती हैं:
(क) निरपेक्ष अभिसरण (Absolute Convergence) का अभाव
अर्थशास्त्र के विकास सिद्धांतों के अनुसार, गरीब राज्यों को अमीर राज्यों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़कर आय के अंतर को पाटना चाहिए (निरपेक्ष अभिसरण)। परंतु 2001–2023 के आंकड़ों का विश्लेषण दर्शाता है कि भारत के राज्यों के बीच निरपेक्ष अभिसरण नहीं हो रहा है। बिहार और अन्य अमीर राज्यों के बीच प्रति व्यक्ति आय का निरपेक्ष अंतर समय के साथ और चौड़ा हुआ है। बिहार केवल ‘सशर्त अभिसरण’ (Conditional Convergence) प्रदर्शित करता है, जिसका अर्थ है कि अपनी वर्तमान कमियों (कम पूँजी, कमजोर संस्थागत क्षमता) के कारण यह अपनी ही एक निम्न-स्तरीय स्थिति (lower steady state) की ओर बढ़ रहा है।
(ख) आय विषमता और भू-स्वामित्व का गहन संकट
यद्यपि बिहार में शीर्ष 10% और निचले 10% परिवारों के बीच आय का अंतर 2014 के 16.5 गुना से घटकर 2025 में 5.4 गुना रह गया है, लेकिन यह किसी संरचनात्मक विकास का परिणाम नहीं बल्कि उच्च-कुशल व बेहतर कमाने वाले श्रमिकों के बाहर प्रवास का परिणाम है।
कृषि क्षेत्र में भूमि का विखंडन चरम पर है:
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बिहार में 95.2 प्रतिशत कृषि जोतें सीमांत (Marginal) श्रेणी (<1 हेक्टेयर) की हैं।
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औसतन जोत का आकार मात्र 0.39 हेक्टेयर है (राष्ट्रीय औसत 1.08 हेक्टेयर)।
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95.2% सीमांत किसानों के पास कुल कृषि योग्य भूमि का केवल 62.7% हिस्सा है, जबकि शेष 4.8% परिवारों के पास 37.3% भूमि केंद्रित है।
(ग) क्षेत्रीय विषमता, आर्थिक अस्थिरता और बेरोजगारी
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क्षेत्रीय असंतुलन: बिहार के भीतर विकास अत्यधिक असमान है। पटना जिला आर्थिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र है, जिसके बाद मध्य कॉरिडोर (बेगूसराय, मुंगेर, भागलपुर) का स्थान आता है। परिधीय और उत्तरी जिले विकास के मापदंडों पर बहुत पीछे हैं।
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आय में उच्च अस्थिरता (Growth Volatility): प्राकृतिक आपदाओं (उत्तरी बिहार में बाढ़ और दक्षिण में सुखाड़) के कारण बिहार की वार्षिक GSDP वृद्धि दर में भारत के सभी राज्यों की तुलना में सबसे अधिक उतार-चढ़ाव/अस्थिरता देखी जाती है।
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महिला श्रम बल भागीदारी (FLFP): बिहार में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी भारत में सबसे कम स्तर पर है। ग्रामीण बिहार में महिला श्रम बल भागीदारी दर मात्र 32% और शहरी क्षेत्रों में 17% से कम है (राष्ट्रीय औसत क्रमशः 48% और 28%)।
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बेरोजगारी व खराब गुणवत्ता वाले रोजगार: औपचारिक क्षेत्र में नौकरियों का अभाव है, और अधिकांश युवा कम वेतन वाले अनौपचारिक कार्यों में लगे हैं।
5. बिहार का अधूरा एजेंडा: ‘बिग पुश’ (Big Push) सुधारों का खाका
शोध पत्र में पॉल रोजेंस्टीन-रोडान (Paul Rosenstein-Rodan) और जेफरी सैक्स (Jeffrey Sachs) की ‘बिग पुश डेवलपमेंट थ्योरी’ (Big Push Theory) का हवाला दिया गया है। इसके अनुसार, अत्यधिक पिछड़े क्षेत्रों में छोटे-मोटे और टुकड़ों में किए गए प्रयास व्यर्थ साबित होते हैं। बिहार को गरीबी के दुचक्र से बाहर निकालने के लिए बुनियादी ढाँचे, मानव पूँजी, संस्थाओं और उत्पादक क्षेत्रों में एक साथ विशाल, समन्वित और व्यापक सुधारों के ‘बिग पुश’ की आवश्यकता है।
लेखकों ने छह मुख्य प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की है:
(1) शिक्षा प्रणाली में सुधार (Education)
यद्यपि प्राथमिक स्तर पर नामांकन लगभग 100% हो चुका है, परंतु गुणवत्ता और उच्च स्तर पर ठहराव (retention) चिंताजनक है:
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सीखने का स्तर (Learning Outcomes): ASER 2024 के अनुसार, कक्षा III के केवल 26.3% बच्चे ही कक्षा II के स्तर का पाठ पढ़ सकते हैं।
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माध्यमिक शिक्षा का संकट: प्राथमिक स्कूल में प्रवेश लेने वाले बच्चों में से केवल 25.3% छात्र ही माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 9-10) पूरी कर पाते हैं (राष्ट्रीय औसत 47.2%)। माध्यमिक स्तर पर छात्र-शिक्षक अनुपात 34:1 है और केवल 13.2% स्कूलों में ही माध्यमिक कक्षाएं उपलब्ध हैं।
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उच्च शिक्षा की दयनीय स्थिति: 18-23 वर्ष के आयु वर्ग में उच्च शिक्षा का सकल नामांकन अनुपात (GER) मात्र 17.1% है (राष्ट्रीय औसत 28.4%)। बिहार में प्रति लाख आबादी पर केवल 7 कॉलेज हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 30 कॉलेजों का है।
नीतिगत सिफारिशें: ‘टीचिंग एट द राइट लेवल’ (TaRL) और ‘मिशन दक्ष’ का पुनर्गठन करना। गुजरात के ‘विद्या समीक्षा केंद्र’ (VSK) की तर्ज पर रीयल-टाइम डेटा मॉनिटरिंग लागू करना। छात्रों की उपस्थिति और अधिगम को ट्रैक करने के लिए ऑटोमेटेड परमानेंट एकैडमिक एकाउंट रजिस्टर (APAAR) और PEN आईडी का पूर्ण क्रियान्वयन करना। माध्यमिक व उच्च शिक्षा में बड़े पैमाने पर शिक्षकों की भर्ती और बुनियादी ढाँचे का विस्तार करना।
(2) स्वास्थ्य एवं पोषण (Health)
बाल कुपोषण के आंकड़े भयावह हैं—बिहार में 43% बच्चे नाटे (Stunted) हैं और 41% बच्चे कम वजन (Underweight) के हैं। शिशु मृत्यु दर (IMR) 47 प्रति हजार है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में डॉक्टरों, नर्सों और जीवनरक्षक दवाओं की भारी कमी है।
नीतिगत सिफारिशें: डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के रिक्त पदों को भरना। आईसीडीएस (ICDS) और आंगनवाड़ी केंद्रों के माध्यम से पोषण अभियानों को मिशन मोड में चलाना। जिला अस्पतालों को मेडिकल कॉलेजों में अपग्रेड कर तृतीयक (tertiary) देखभाल को मजबूत करना।
(3) सुशासन, राज्य क्षमता और कानून-व्यवस्था (Governance & Law and Order)
बिहार की सबसे बड़ी बाधा ‘राज्य क्षमता’ (State Capacity) की कमी है। मुरलीधरन (2024) के शोध के संदर्भ में, सार्वजनिक सेवाओं की कुशल आपूर्ति के लिए प्रशासनिक दक्षता आवश्यक है।
नीतिगत सिफारिशें: लोक सेवाओं में पारदर्शिता हेतु डिजिटल गवर्नेंस का पूर्ण उपयोग। पुलिस बल का आधुनिकीकरण और त्वरित न्याय के लिए न्यायिक बुनियादी ढाँचे का विस्तार। सिविल सेवकों के प्रदर्शन-आधारित मूल्यांकन को लागू करना।
(4) बाढ़ एवं प्राकृतिक आपदा प्रबंधन (Recurring Floods)
विभाजन के बाद उत्तरी बिहार का 73% भूभाग नेपाल से बहकर आने वाली नदियों (कोसी, गंडक, बागमती आदि) की विनाशकारी बाढ़ से प्रतिवर्ष प्रभावित होता है। इससे बुनियादी ढाँचा नष्ट होता है और कृषि आय में भारी अनिश्चितता आती है।
नीतिगत सिफारिशें: नेपाल के साथ कूटनीतिक समन्वय कर उच्च बाँधों व जलभंडारण का निर्माण। नदियों को आपस में जोड़ने (River Interlinking) और वैज्ञानिक तटबंध प्रबंधन। जल-निकासी (drainage) प्रणालियों का आधुनिकीकरण और बाढ़-प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देना।
(5) गायब निजी क्षेत्र और औद्योगीकरण (The Missing Private Sector)
बिहार में निजी पूँजीगत निवेश का नगण्य होना आर्थिक पिछड़ापन बनाए रखने का मुख्य कारण है। बिहार देश में लीची और मखाना का सबसे बड़ा उत्पादक है, परंतु प्रसंस्करण (processing) इकाइयाँ न होने से इसका मूल्य संवर्धन (value addition) राज्य से बाहर चला जाता है।
नीतिगत सिफारिशें: ‘बिहार औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति 2025’ (BIIPP-2025) का पारदर्शी क्रियान्वयन। मखाना, लीची, मक्का और आम के लिए एग्रो-प्रोसेसिंग क्लस्टर विकसित करना। प्लग-एंड-प्ले औद्योगिक पार्क, सिंगल-विंडो क्लीयरेंस और लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी में सुधार करना।
(6) महिला सशक्तिकरण और लैंगिक विषमता (Gender & Empowerment)
महिलाओं की निम्न श्रम बल भागीदारी (FLFP) राज्य की उत्पादकता को आधा कर देती है।
नीतिगत सिफारिशें: ‘जीविका’ (JEEViKA – बिहार ग्रामीण जीविकोपार्जन प्रोत्साहन समिति) स्वयं सहायता समूह मॉडल का विस्तार करके महिलाओं को सूक्ष्म-उद्यमों और औपचारिक वित्त से जोड़ना। बालिकाओं के लिए मुफ्त शिक्षा, परिवहन और कार्यस्थल सुरक्षा सुनिश्चित करना।
6. सुधारों का वित्तीय पोषण और ऋण वहनीयता (Financing the Reforms)
इन व्यापक सुधारों को लागू करने के लिए विशाल वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होगी। शोध पत्र बिहार के ऋण स्थायित्व (Debt Sustainability) और राजकोषीय स्थिति का गहराई से आकलन करता है।
(क) बिहार के राजकोषीय संकेतकों का तुलनात्मक विश्लेषण
| राजकोषीय मापदंड (% GSDP) | 2001–04 (औसत) PDF | 2005–19 (औसत) PDF | 2020–24 (औसत) PDF |
| राजस्व संतुलन (Revenue Balance) | -1.8% | +1.2% (अधिशेष) | -1.5% |
| राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) | -6.8% | -2.7% | -4.3% |
| स्वयं का कर राजस्व (Own Tax Revenue) | < 5.0% | 6.0% | 6.0% – 6.5% |
| केंद्रीय अंतरणों पर निर्भरता (Central Transfers Share) | ~70% | ~70% | ~70% |
(स्रोत: NCAER शोध पत्र, MoSPI व RBI आँकड़े)
(ख) वित्तीय रणनीति के मुख्य स्तंभ
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स्वयं के कर राजस्व में वृद्धि: 2016 की शराबबंदी के कारण राज्य को आबकारी राजस्व में भारी नुकसान हुआ। राज्य को वाणिज्यिक कर, स्टांप व पंजीकरण शुल्क, और भूमि राजस्व प्रशासन का डिजिटलीकरण करके स्वयं के कर राजस्व को GSDP के 8-9% तक ले जाना होगा।
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व्यय की दक्षता (Spending Efficiency): गैर-उत्पादक सब्सिडी को सीमित कर पूँजीगत व्यय (Capital Expenditure) का दायरा बढ़ाना।
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केंद्रीय सहायता व वित्त आयोग: भारत का वित्तीय संघवाद (Fiscal Federalism) कर संग्रह की शक्तियां केंद्र को देता है। बिहार की 70% राजस्व निर्भरता केंद्र से हस्तांतरण पर है। बिहार को वित्त आयोग के समक्ष अपनी विशाल आबादी और बहुआयामी गरीबी के आधार पर अधिक विशेष अनुदानों की माँग जारी रखनी होगी।
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विवेकपूर्ण ऋण और गतिशीलता: चूँकि बिहार की वास्तविक GSDP वृद्धि दर (7.3%) वास्तविक ब्याज दरों से अधिक रही है, इसलिए यह सकारात्मक विकास-ब्याज अंतर (Growth-Interest Rate Differential) राज्य को पूँजीगत परिसंपत्तियों (सड़क, सिंचाई, स्कूल, अस्पताल) के निर्माण हेतु विवेकपूर्ण सीमाओं के भीतर अतिरिक्त ऋण लेने की राजकोषीय गुंजाइश (Fiscal Space) प्रदान करता है।
7. निष्कर्ष एवं आशावाद के आधार: ‘विकसित बिहार @2047’
बिहार का आर्थिक इतिहास औपनिवेशिक शोषण, नीतिगत विफलताओं और संस्थागत पतन की एक जटिल कहानी रहा है। परंतु 2005 के बाद का कायाकल्प यह साबित करता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, सुशासन और बुनियादी ढाँचे में लक्षित निवेश से विषम परिस्थितियों को बदला जा सकता है।
बिहार के पास भविष्य के लिए आशावादी होने के मजबूत आधार हैं:
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अनुकूल जनसांख्यिकी (Favourable Demographics): जहाँ अन्य राज्य और देश वृद्ध होती आबादी का सामना कर रहे हैं, वहीं बिहार के पास भारत का सबसे युवा कार्यबल है।
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बढ़ती आकांक्षाएँ और उद्यमशीलता: बिहार के युवाओं में शिक्षा और आर्थिक उन्नति की प्रबल आकांक्षा है।
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प्राकृतिक संसाधन: प्रचुर जल संसाधन और अत्यंत उपजाऊ कृषि भूमि, जो एग्रो-प्रोसेसिंग और हरित क्रांति 2.0 का आधार बन सकती है।
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प्रवासी समुदाय (Large Diaspora): भारत के अन्य राज्यों और विदेशों में फैला बिहार का विशाल, कुशल व उद्यमी प्रवासी समुदाय पूँजी निवेश, ज्ञान हस्तांतरण और मेंटरशिप प्रदान कर सकता है।
संक्षेप में, यदि बिहार की नई सरकार पूर्व में शुरू किए गए विकासमूलक सुधारों को आगे बढ़ाते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, सुशासन, बाढ़ नियंत्रण, निजी क्षेत्र के विकास और महिला सशक्तिकरण के छः प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में एक साथ ‘बिग पुश’ (Big Push) लागू करती है, तो बिहार न केवल अन्य राज्यों के साथ आर्थिक अभिसरण हासिल करेगा, बल्कि भारत को 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनाने के सपने का एक अग्रदूत और विकास का शक्तिशाली इंजन बनेगा।