जब भी देश में कुपोषण के आंकड़े (NFHS-5) आते हैं, तो सरकारी विज्ञापनों और जागरूकता अभियानों की बाढ़ आ जाती है। लेकिन एक कड़वा सच जिसे हम अक्सर दबा देते हैं, वह यह है कि कुपोषण का बोझ केवल माँ के कंधों पर डालकर हम अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपा रहे हैं। आंकड़ों और जमीनी हकीकत का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि यह “जागरूकता” की कमी नहीं, बल्कि “संसाधनों और समर्थन” की भारी किल्लत का मामला है।
दोषारोपण की राजनीति बनाम ढांचागत वास्तविकता
दशकों से हमारा नैरेटिव ‘माँ को जागरूक करने’ पर टिका है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि एक माँ, जो ‘समय की गरीबी’ (Time Poverty) से जूझ रही है, जिसके पास घरेलू काम और बाहर की मजदूरी के बीच खुद के लिए भी समय नहीं है, वह पोषण का ‘सही चुनाव’ कैसे करे?
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बदलाव की दरकार: हमें ‘व्यक्तिगत जिम्मेदारी’ के दायरे से बाहर निकलकर ‘साझा जवाबदेही’ (Shared Accountability) की ओर बढ़ना होगा।
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दोष मढ़ना बंद करें: जब हम कहते हैं कि “माताओं को बेहतर विकल्प चुनने चाहिए”, तो हम उस सिस्टम को क्लीन चिट दे देते हैं जो उन्हें सस्ता और सुलभ पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने में विफल रहा है।
वह नींव जिस पर पोषण टिका है (Structural Drivers)
कुपोषण केवल भोजन की कमी नहीं है; यह एक चक्र है जो सामाजिक और आर्थिक विषमताओं से पोषित होता है।
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खाद्य वातावरण का संकट: आज ग्रामीण भारत के छोटे से छोटे गांव में ‘अल्ट्रा-प्रोसेस्ड’ चिप्स और बिस्कुट तो मिल रहे हैं, लेकिन क्या वहां स्थानीय और किफायती पौष्टिक आहार की उपलब्धता सुनिश्चित है? बाज़ार ने पैकेट बंद खाने की समस्या तो हल कर दी, लेकिन पोषण को पीछे छोड़ दिया।
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पितृसत्तात्मक मानदंडों का दबाव: पोषण का फैसला केवल रसोई तक सीमित नहीं है। इसमें पति, सास-ससुर और सामाजिक ढांचे का हस्तक्षेप होता है। जब तक परिवार के पुरुष सदस्य पोषण की जिम्मेदारी में भागीदार नहीं बनेंगे, तब तक बदलाव नामुमकिन है।
फ्रंटलाइन वर्कर्स: व्यवस्था की रीढ़, फिर भी उपेक्षित
हमारी आशा (ASHA), एएनएम (ANM) और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ही इस जंग की असली सिपाही हैं। लेकिन हकीकत यह है कि वे अत्यधिक कार्यभार (Overburdened) और कम संसाधनों (Under-supported) के बीच काम कर रही हैं। उन्हें केवल ‘संदेशवाहक’ समझने के बजाय ‘सशक्त प्रबंधक’ बनाना होगा।
निर्णायक ‘1,000 दिन’ और भविष्य की जैविक असमानता
बच्चे के जीवन के शुरुआती 1,000 दिन उसके मस्तिष्क और शारीरिक विकास की आधारशिला रखते हैं। यदि इस दौरान पोषण की कमी रह जाती है, तो वह ‘जैविक असमानता’ (Biological Inequality) में बदल जाती है। दो साल की उम्र के बाद होने वाला नुकसान अक्सर अपरिवर्तनीय (Irreversible) होता है।
भारत को कुपोषण मुक्त बनाने के लिए हमें बजट और योजनाओं के लॉन्च से आगे बढ़कर ‘लास्ट-माइल डिलीवरी’ और ‘परिणामों’ (Outcomes) को मापना होगा।
आगे की राह (The Way Forward):
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सिस्टम को जवाबदेह बनाएं: पोषण के लिए केवल माँ को नहीं, बल्कि जिला प्रशासन और वितरण प्रणालियों को जिम्मेदार ठहराया जाए।
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समय की गरीबी का समाधान: शिशु देखभाल में सामुदायिक और पारिवारिक सहयोग को संस्थागत रूप देना होगा।
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वास्तविक डेटा ट्रैकिंग: केवल राशन वितरण को नहीं, बल्कि बच्चों के वास्तविक शारीरिक विकास को ट्रैक करना अनिवार्य हो।
बॉटम लाइन: समाधान अज्ञात नहीं हैं, प्राथमिकताएं गलत हैं। जब तक हम ‘डिलीवरी’ को प्राथमिकता नहीं देंगे, भारत का बचपन इसकी कीमत चुकाता रहेगा।