‘POSH कानून’ से क्यों कतराती हैं कंपनियाँ?
कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए बना ‘पॉश एक्ट’ (Prevention of Sexual Harassment – POSH Act, 2013) भारत के कॉर्पोरेट इतिहास का एक मील का पत्थर है। लेकिन 11 साल बीत जाने के बाद भी एक कड़वा सवाल आज भी खड़ा है – कंपनियां इस कानून को पूरी शिद्दत से लागू करने से कतरा क्यों रही हैं?
हालिया रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की राय का गहराई से पोस्टमार्टम करें, तो इस “झिझक” के पीछे कई गहरे सामाजिक और आर्थिक कारण छिपे हैं।
‘लोग क्या कहेंगे?’: छवि खराब होने का डर
अधिकांश कंपनियों के लिए ‘POSH’ एक सुरक्षा कवच के बजाय एक ‘पीआर आपदा’ (PR Disaster) जैसा लगता है।
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तथ्य: कंपनियों को लगता है कि अगर उन्होंने POSH मामलों को गंभीरता से रिपोर्ट किया, तो बाज़ार में यह संदेश जाएगा कि उनका कार्यस्थल असुरक्षित है।
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नतीजा: मामलों को रफा-दफा करने या “आंतरिक समझौता” करने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, जिससे अपराधी का हौसला बढ़ता है।
अनुपालन का बोझ बनाम दिखावा
कानून कहता है कि 10 से अधिक कर्मचारियों वाली हर संस्था में एक ‘आंतरिक शिकायत समिति’ (ICC) होनी चाहिए। लेकिन हकीकत में:
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कई कंपनियों में यह समितियां केवल कागजों पर मौजूद हैं।
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छोटी और मध्यम स्तर की कंपनियों (MSMEs) के लिए इसके कानूनी अनुपालन का खर्च और प्रक्रिया एक बोझ की तरह महसूस होती है।
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अधिकांश कर्मचारी यह भी नहीं जानते कि उनकी कंपनी में ICC का अध्यक्ष कौन है।
‘विक्टिम शेमिंग’ और शिकायतकर्ता का डर
न्यूज़ पोर्टल के संपादक के तौर पर मैंने कई ऐसी कहानियाँ देखी हैं जहाँ शिकायत करने वाली महिला को ही ‘मुसीबत खड़ी करने वाली’ मान लिया जाता है।
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करियर का दांव: महिलाओं को डर रहता है कि शिकायत करने पर उन्हें भविष्य में प्रमोशन नहीं मिलेगा या उन्हें काम छोड़ने पर मजबूर किया जाएगा।
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व्यवस्था की विफलता: जब टॉप मैनेजमेंट ही इस मुद्दे को ‘गंभीरता’ के बजाय ‘जटिलता’ की तरह देखता है, तो पूरा सिस्टम फेल हो जाता है।
ट्रेनिंग और जागरूकता का अभाव
POSH ट्रेनिंग अक्सर साल में एक बार होने वाला ‘टिक-मार्क’ अभ्यास बनकर रह गया है।
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समस्या: ट्रेनिंग में केवल कानूनी धाराओं की बात होती है, लेकिन ‘अप्रत्यक्ष व्यवहार’ (Subtle harassment) या ‘ग़लत स्पर्श’ जैसी बारीकियों पर चर्चा नहीं होती।
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ज़रूरत: जब तक पुरुषों को भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाकर उन्हें ‘सेंसिटाइज’ नहीं किया जाएगा, तब तक बदलाव नहीं आएगा।
हमारा नज़रिया:
कंपनियों को यह समझना होगा कि POSH कानून एक ‘लायबिलिटी’ (Liability) नहीं, बल्कि एक ‘एसेट’ (Asset) है। एक सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल न केवल नैतिकता की दृष्टि से सही है, बल्कि यह उत्पादकता (Productivity) भी बढ़ाता है।
आगे की राह (The Way Forward):
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शून्य सहनशीलता (Zero Tolerance): ऊपरी प्रबंधन को स्पष्ट संदेश देना होगा कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी बड़ा परफॉर्मर क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है।
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बाहरी विशेषज्ञों की भूमिका: ICC में बाहरी सदस्यों (NGO या कानूनी विशेषज्ञों) की भूमिका को और अधिक पारदर्शी बनाया जाए ताकि पक्षपात की गुंजाइश न रहे।
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सिर्फ रिपोर्टिंग नहीं, सुरक्षा: कंपनियों को अपनी एनुअल रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से POSH अनुपालन का ब्यौरा देना चाहिए, न कि केवल औपचारिकता निभानी चाहिए।
निष्कर्ष: कानून किसी भी समस्या का आधा समाधान होता है, बाकी आधा समाधान उस संस्था की ‘नियत’ पर निर्भर करता है। जब तक कंपनियाँ POSH एक्ट को ‘डर’ के बजाय ‘ईमानदारी’ से नहीं अपनाएंगी, तब तक कार्यस्थल पर समानता का सपना अधूरा ही रहेगा।