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10 साल, 4 मंत्री और अंतहीन विवाद: शिक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट कार्ड!

शिक्षा मंत्रालय और शिक्षण के क्षेत्र में मौजूदा सरकार की असफलताओं की बात हो और स्मृति ईरानी का नाम याद न आए, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। उनकी दी गई डिग्रियों, जो चुनावी हलफनामों में दर्ज थीं, उनपर विवाद शुरू हुआ और फिर आगे पता चला कि सचमुच जो शैक्षणिक योग्यताएं बताई गई थीं, वे थीं ही नहीं। भारत में वैसे भी राजनेता होने के लिए कोई डिग्री चाहिए नहीं, तो अगर हलफनामों में सच भी लिखा जाए तो किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। फिर भी बिहार के सम्राट चौधरी से लेकर कई बड़े नेताओं तक लोग गलत या भ्रामक क्यों लिख जाते हैं, पता नहीं। सोशल मीडिया के दौर में इनकी पोल खुलनी ही है, यह तो समझना होगा। जो भी हो, यह केवल विवादों की शुरुआत थी।

स्मृति ईरानी के शिक्षा मंत्री रहने के दौर का सबसे बड़ा विवाद था हैदराबाद यूनिवर्सिटी से जुड़ा हुआ। रोहित वेमुला नाम के एक छात्र ने आत्महत्या कर ली थी। बाद में पुलिस जांच में उसके दलित न होने, गलत कागजों के जरिए एडमिशन लेने या भारी कर्ज में डूबे होने जैसी बातें सामने आईं, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। छात्रों से वैचारिक मतभेद और असंतोष बहुत बढ़ गया था। मंत्रालय पर अत्यधिक प्रशासनिक हस्तक्षेप और दबाव बनाने के आरोप लगे, जिससे देशव्यापी छात्र विरोध प्रदर्शन हुए। अब तो “रोहित वेमुला” के नाम पर एक एक्ट बनाकर इतिहास में दर्ज होने लायक असफलता सत्ता पक्ष से चिपका दी गई है।

इसी दौर में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हुए कथित ‘राष्ट्रविरोधी’ नारों के विवाद के दौरान मंत्रालय के कड़े रुख के कारण कैंपस में भारी तनाव रहा। कम्युनिस्ट पार्टी से राजनीति शुरू करके कांग्रेस में जाने वाले कुछ नेताओं के लिए यह अच्छा अवसर रहा और ऐसा कहा जा सकता है कि स्मृति ईरानी की एक असफलता ‘राष्ट्रविरोधी’ कहलाने वाली ताकतों को नए नेता देना भी था। इस मामले में डी. राजा जैसे कम्युनिस्ट नेताओं के बच्चे भी शामिल थे, लेकिन बाद की पुलिस कार्रवाई और जांच आदि में उनके बेदाग निकल जाने से समर्थकों का उत्साह भी कम तो हुआ ही होगा। इसी दौर में दिल्ली विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कुलपतियों से उनके टकराव की भी चर्चा रही।

स्मृति ईरानी का कार्यकाल, जो मई 2014 से जुलाई 2016 तक में सिमटा, तो प्रकाश जावड़ेकर को जुलाई 2016 से मई 2019 तक का एक छोटा सा अवसर मिला। पेपर लीक, जो एक पुराना मुद्दा रहा है, उसकी बातें शिक्षा मंत्रालय के प्रकाशवान युग में फिर से सामने आईं और 2018 में सीबीएसई की कक्षा 10वीं के गणित और 12वीं के अर्थशास्त्र के पेपर लीक हो गए। इससे परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठे और देश भर के छात्रों व अभिभावकों में नाराजगी देखी गई। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) में अपने पक्ष के लोगों की पैठ बनाना अब तक सत्ता पक्ष शुरू कर चुका था और पुराने व दूसरे पक्ष के शिक्षाविदों ने इसकी आलोचना शुरू कर दी थी।

अच्छी बात भी अगर सही ढंग से न रखी जाए तो उसके नतीजे कैसे उल्टे होते हैं, इसका उदाहरण भी शिक्षा मंत्रालय के ‘प्रकाशवान’ काल में दिखा। स्कूलों को दिए एक बयान में उन्होंने कहा था कि वे सिर्फ सरकारी फंडिंग पर निर्भर न रहें और पूर्व छात्रों (Alumni) से मदद मांगें, जिसके बाद विपक्ष ने सरकार पर शिक्षा के निजीकरण और जिम्मेदारी से पीछे हटने का आरोप लगाया था। इनका कार्यकाल जल्दी ही समाप्त हुआ और मई 2019 से जुलाई 2021 तक के लिए रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ आ गए। इनका आधा कार्यकाल कोविड-19 महामारी के प्रबंधन में बीता, जिसमें ऑनलाइन शिक्षा की बुनियादी कमियां उजागर हुईं।

इसके अलावा रमेश पोखरियाल काल में ही जेएनयू में हॉस्टल फीस कई गुना बढ़ाने के फैसले के खिलाफ छात्रों ने दो महीने से अधिक समय तक प्रदर्शन किया। उनकी ज्योतिष और प्राचीन विज्ञान को लेकर दी गई डिग्रियों और कुछ बयानों पर विवाद हुआ। महामारी के दौरान अचानक ऑनलाइन पढ़ाई लागू करने से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट न होने के कारण भारी नुकसान हुआ। इस नुकसान को अखबार और एनजीओ अपनी रिपोर्टों में दर्ज करते रहे, यानी इतिहास में इनकी असफलता भी दर्ज रहने वाली है। कार्यकाल बहुत छोटा सा था तो जाहिर है असफलताएं भी कम रहीं।

पुराने दौर से पेपर लीक चल रहा है, यह बात जो हमने शुरू में कही थी, वह इसलिए कही थी क्योंकि जुलाई 2021 में धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री बनकर आए। ये चुपचाप काम करने वाले व्यक्ति माने जाते थे और 1997 में एक पेपर लीक का ही ओडिशा में विरोध करने से इनकी शुरुआत याद की जा सकती है। उसी विरोध प्रदर्शन के बाद ये संघ के छात्र संगठन एबीवीपी (ABVP) से भाजपा में आए थे। यूजीसी पर सत्ता पक्ष के लोगों का इनके दौर तक पूरी तरह कब्जा हो चुका था, ऐसा कहा जा सकता है क्योंकि अब यूजीसी और अन्य संस्थाओं में एक भी नाम किसी और पक्ष का गिनाया नहीं जा सकता। इनके विवाद यूजीसी द्वारा प्रस्तावित एक काले कानून के साथ सुनाई देने लगे।

गौर करने लायक है कि 2021 से 2026 की शुरुआत तक ये विवादों और आरोपों से दूर रहने में अभूतपूर्व रूप से सफल रहे हैं। एनसीईआरटी (NCERT) की किताबों से इतिहास के कुछ अध्यायों (जैसे मुगल काल, गुजरात दंगे और डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत) को हटाने या छोटा करने को लेकर शिक्षाविदों और विपक्षी दलों ने सरकार पर वैचारिक एजेंडा थोपने का आरोप लगाया। चिकित्सा प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) में बड़े पैमाने पर धांधली, पेपर लीक और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की तकनीकी विफलता के गंभीर आरोप लगे। इसके कारण देश भर में छात्रों द्वारा तीखे विरोध प्रदर्शन किए गए और उनके इस्तीफे की पुरजोर मांग लंबे समय से जारी है।

तो अब सवाल उठता है कि क्या सरकार बहादुर जनता की सुनेगी? इसके लिए एक बार फिर से धर्मेंद्र प्रधान का इतिहास देख लेते हैं। धर्मेंद्र प्रधान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उससे जुड़े संगठनों से गहराई से जुड़े रहे हैं। वर्तमान में भी उन्हें भाजपा के भीतर संघ की पृष्ठभूमि (RSS Ideologue) वाले सबसे मजबूत और भरोसेमंद मंत्रियों में गिना जाता है। वे अक्सर संघ के विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों और पथ संचलनों में भी हिस्सा लेते हैं। धर्मेंद्र प्रधान एबीवीपी के ओडिशा राज्य सचिव और फिर 1995 से 1997 के बीच राष्ट्रीय सचिव के पद पर भी रहे। एबीवीपी नेता के तौर पर ही उन्होंने 1997 में ओडिशा की तत्कालीन सरकार के खिलाफ राज्य स्तरीय परीक्षा के पेपर लीक मामले में सचिवालय के बाहर एक बड़े छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया था, जिसमें पुलिस लाठीचार्ज के दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

धर्मेंद्र प्रधान 1998 में औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुए। इसके बाद वे भाजपा के युवा संगठन (BJYM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और फिर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बने। यही वजह है कि कथित रूप से कई पेपर लीक के मामलों के उनके कार्यकाल में सामने आने के बाद भी, उन पर कार्रवाई होती नहीं दिख रही। गौर करने लायक यह भी है कि यूजीसी के विवादित नियमों वाला मुद्दा हो या पेपर लीक का, शुरुआत विपक्ष ने नहीं बल्कि सत्ता पक्ष के समर्थक माने जाने वाले लोगों ने ही की थी। सत्ता पक्ष की यह एक बड़ी असफलता है कि अपने लोगों के असंतोष की वह सुनवाई नहीं कर पा रही है। जल्दी ही धर्मेंद्र प्रधान पर कार्रवाई होगी ऐसा लगता तो नहीं, हां असंतोष के नतीजे चुनावों पर कितना असर डालेंगे, यह निकट भविष्य में जरूर दिख जाएगा!

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