गंभीर मुद्दों पर सोशल मीडिया में चर्चा करने के बदले लोग एंटरटेनमेंट पर ध्यान देते होंगे, इसलिए ऐसा होता होगा, ऐसा हमें भी कई वर्ष पहले लगता था। बाद में समझ में आया कि सोशल मीडिया का एल्गोरिदम डिज़ाइन ही इसी बात को ध्यान में रखकर किया जाता है। इसमें जब आप “अरब स्प्रिंग” जैसी घटनाओं की थोड़ी सी जानकारी मिला लेंगे तो समझ में आता है कि सरकारें गिराने, तोड़-फोड़ और असंतोष में जिनकी रूचि हो, उनके लिए एल्गोरिदम बड़ी इंटरेस्टिंग चीज होगी।
भारत के आयातित विचारधारा के समाजशास्त्रियों को जाति सूंघने से फुर्सत हुई नहीं, इसलिए कभी उन्होंने सोशल मीडिया से जुड़े मुद्दों पर शोध नहीं किया, या निजी हित आड़े आते थे, इसलिए चुप रहे, या फिर सामर्थ्य ही नहीं था इसलिए चुप्पी साधे रहे, ये खुद में ही एक शोध का मुद्दा हो सकता है। तीन हाइपोथेसिस तो हैं ही! इन मुद्दों को देखना हो तो ये तस्वीर महत्वपूर्ण हो जाती है। सोशल मीडिया (फेसबुक) पर एआई से बनाई इस वीडियो को डाला तो कुछ घंटे में इसकी रीच 43 हजार व्यूज पर पहुँच गयी थी।
आम तौर पर मेरे रील की रीच हजार व्यूज के आस-पास ठहरती है। यानी इसमें कुछ तो था जो अनोखा था? सबसे पहली चीज यहाँ गौर करने लायक ये है कि सत्ता पक्ष का मजाक उड़ाते ऐसे वीडियो को पोस्ट करके एक्सपेरिमेंट करने के लिए हिम्मत चाहिए। हमारे अकादमिक जगत में ऐसी हिम्मत बची है या नहीं पता नहीं। दूसरी बात ये है कि “पैरा-सोशल री-एंकरिंग” या फिर ACLR जैसे जुमले अंग्रेजी में आते हैं जी, हिंदी में कोई लिखकर देता, इस इन्तजार में बैठे हैं, तो ऐसा कोई प्रयोग किया जा सकता है, ये सोचना भी कठिन होगा।
पैरा-सोशल री-एंकरिंग को आसानी से स्पाइडरमैन या मिशन इम्पॉसिबल जैसी फिल्मों से समझ सकते हैं। शुरू-शुरू में स्पाइडरमैन जैसा कोई नायक पसंद आता है। फिर जिस अभिनेता-अभिनेत्री ने वो किरदार निभाया हो, उसी को व्यक्ति आदर्श के रूप में देखने लगेगा। पुराने वाले रामायण के अरुण गोविल वाली राम की छवि देखने में आप इसे देख सकते हैं। अमिताभ बच्चन कैसे हर चीज के प्रचार में दिखने लगे थे वहाँ भी इसी से जुड़े सिद्धांत का प्रयोग होता है। हाँ, सिर्फ अंग्रेजी फिल्मों में ही नहीं, भारत में भी आपने इसे देखा है।
तो मोटे तौर पर जैसे पहले हम श्री राम की छवि पर टिके थे, एंकर वहाँ लगा था और उससे री-एंकरिंग करके अरुण गोविल की छवि पर पहुंचे करीब-करीब वैसा ही है पैरा-सोशल री-एंकरिंग। पहले आपने “सर्व गर्म वडापाव” माफ कीजिएगा, सर्वधर्म समभाव चखा, फिर दोस्ती रिश्तेदारी में बदलने लगी, और फिर पता चला डेमोग्राफी बदल गयी है, ये भी बिलकुल वैसा ही है। इस पूरी प्रक्रिया को समझने में समस्या केवल इतनी थी कि ये अंग्रेजी में लिखा गया था और भारत के एक बड़े वर्ग ने भाषा सीख लेने के बदले, “ये पुस्तक हिंदी में आती है क्या?” का प्रश्न करके आगे बढ़ जाना ठीक समझा।
बाकी समय के साथ बदलते हथियारों से सुचना क्रांति के युग में हम लड़ पाएंगे या नहीं, ये तो हमारे चुनावों पर ही निर्भर रहेगा।