विशेष लेख | बिहार विमर्श
कटिहार। कटिहार को कभी “बिहार की जूट राजधानी” के नाम से जाना जाता था। इसका मुख्य कारण था यहाँ स्थित दो विशाल जूट मिलें—कटिहार जूट मिल्स लिमिटेड (पुरानी जूट मिल) तथा राय बहादुर हरदुतराय मोतीलाल चमरिया (RBHM) जूट मिल, जिसे आम लोग ‘नई जूट मिल’ के नाम से जानते थे। इन दोनों मिलों ने केवल कटिहार ही नहीं, बल्कि पूरे सीमांचल क्षेत्र की अर्थव्यवस्था, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान को दशकों तक दिशा दी। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि कटिहार ने शहर का आकार ही इन्हीं जूट मिलों की बदौलत लिया।
जूट की खेती से उद्योग स्थापित होने तक का सफर
मिथिला और पूर्णिया प्रमंडल में अठारहवीं शताब्दी से ही जूट की खेती होती रही है। इस क्षेत्र की उपजाऊ भूमि और अनुकूल जलवायु जूट उत्पादन के लिए अत्यंत उपयुक्त थी। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में जूट की माँग बढ़ी, तब ब्रिटिश शासन ने यहाँ औद्योगिक संभावनाएं तलाशनी शुरू कीं।
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पुरानी जूट मिल: 25 जून 1934 को ‘कटिहार जूट मिल्स लिमिटेड’ का गठन किया गया।
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नई जूट मिल (RBHM): लगभग 1935 में राय बहादुर हरदुतराय मोतीलाल चमरिया जूट मिल की स्थापना हुई। यह एक निजी उद्योग था, जो शीघ्र ही बिहार के सबसे बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों में गिना जाने लगा।
रेलवे संपर्क और स्वर्णिम दौर
कटिहार पहले से ही पूर्वोत्तर भारत का एक प्रमुख रेलवे जंक्शन बन चुका था। आसपास के जिलों, पश्चिम बंगाल और नेपाल से कच्चा जूट आसानी से मिल तक पहुँचता था, और तैयार जूट उत्पाद रेलमार्ग से देश-विदेश भेजे जाते थे।
एक समय ऐसा था जब अकेले नई जूट मिल में लगभग 10,000 मजदूर कार्यरत थे। दोनों मिलों को मिलाकर हजारों परिवारों की आजीविका इन्हीं पर निर्भर थी। मिल परिसर में आवासीय कॉलोनियाँ, स्कूल, अस्पताल, खेल मैदान, कालीबाड़ी, क्लब और बाज़ार विकसित हुए।
संघर्ष की शुरुआत और ऐतिहासिक अनशन
समय के साथ पुरानी तकनीक, बढ़ती उत्पादन लागत, आर्थिक संकट और प्रबंधन संबंधी समस्याओं ने इस उद्योग को कमजोर करना शुरू कर दिया:
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1977 का संकट: 1977 में नई जूट मिल पहली बार बंद हो गई, जिससे 10 हजार मजदूरों का भविष्य अंधकार में चला गया।
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37 दिनों का ऐतिहासिक अनशन: स्थानीय नेता युवराज सिंह के नेतृत्व में मजदूरों ने 37 दिनों तक ऐतिहासिक आमरण अनशन किया।
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सरकारी अधिग्रहण: मजदूरों के संघर्ष के आगे झुकते हुए 18 अगस्त 1978 को केंद्र सरकार ने मिल का अधिग्रहण कर पुनः संचालन शुरू कराया। बाद में 1980 में ‘राष्ट्रीय जूट निर्माता निगम’ (NJMC) ने इसका संचालन संभाला।
अंतिम पतन और पलायन की त्रासदी
सरकारी अधिग्रहण के बावजूद समस्याएँ समाप्त नहीं हुईं और उत्पादन लगातार घटता गया।
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23 मार्च 2004: RBHM जूट मिल का उत्पादन पूरी तरह बंद कर दिया गया।
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VRS और पलायन: कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) देकर हटाया गया। 2011 तक अधिकांश श्रमिक बाहर हो चुके थे।
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कृषि पर असर: जूट किसानों को उचित बाज़ार न मिलने के कारण उन्होंने मक्का, मखाना और अन्य फसलों की ओर रुख कर लिया। हजारों युवाओं और मजदूरों को रोजगार की तलाश में दिल्ली, पंजाब और गुजरात जैसे राज्यों की ओर पलायन करना पड़ा।
भविष्य की राह और यक्ष प्रश्न
कटिहार जूट मिल का इतिहास यह सीख देता है कि किसी उद्योग के बंद होने से केवल मशीनें नहीं रुकतीं, बल्कि एक पूरे शहर की धड़कन, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के सपने प्रभावित होते हैं।
आज भले ही बंद पड़ी जूट मिलों की इमारतें और जंग लगी मशीनें वीरान खड़ी हों, लेकिन एक सवाल सीमांचल के मानस पटल पर आज भी तैरता है—क्या कटिहार अब तक ऐसा कोई दूरदर्शी नेतृत्व नहीं दे पाया, जो इस शहर की गौरवशाली औद्योगिक विरासत को पुनर्जीवित कर सके? यदि आधुनिक तकनीक और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ इस उद्योग को पुनर्जीवित किया जाए, तो यह केवल एक मिल का पुनः संचालन नहीं, बल्कि पूरे सीमांचल का आर्थिक पुनर्जागरण होगा।
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