हरियाणा की राजनीति में एक बड़ा सामाजिक-राजनीतिक बदलाव देखा जा रहा है। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की इस विशेष रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) हरियाणा में एक नई राजनीतिक बिसात बिछा रही है, जिसका मूल आधार “दलित मतों का विभाजन करना और उन्हें एक व्यापक हिंदू पहचान से जोड़ना” है।
कौशल और रणनीति के इस नए ताने-बाने को समझने के लिए कुरुक्षेत्र और करनाल की हालिया घटनाएं और बीजेपी की सामाजिक इंजीनियरिंग काफी अहम हैं।
करनाल की घटना और राजनीति का नया व्याकरण
हाल ही में करनाल में 25 वर्षीय बीरू वाल्मीकि की हत्या के बाद आयोजित श्रद्धांजलि सभा में लगे नारे—“जय भीम, जय वाल्मीकि, जय श्री राम”—हरियाणा के बदलते राजनीतिक मिजाज को बखूबी बयां करते हैं।
-
त्वरित कार्रवाई: बीरू की हत्या के कुछ ही घंटों के भीतर पुलिस ने रोड़ (ऊपरी जाति) समुदाय के दो संदिग्ध आरोपियों को मुठभेड़ में मार गिराया। प्रशासन का यह त्वरित कदम हिसार की पुरानी घटनाओं से बिल्कुल विपरीत था, जहाँ कार्रवाई में देरी हुई थी।
-
हिंदू संगठनों का साथ: बीरू के अंतिम संस्कार और विरोध प्रदर्शनों में वाल्मीकि समुदाय के नेताओं के साथ ‘हिंदू रक्षा दल’ के सदस्य भी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े दिखे।
यह घटना दर्शाती है कि राज्य में ‘दलित अस्मिता’ और ‘व्यापक हिंदू पहचान’ को अब एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है।

‘जाट बनाम गैर-जाट’ और अनुसूचित जातियों (SC) का विभाजन
हरियाणा पारंपरिक रूप से जाट-प्रभावित राजनीति का केंद्र रहा है। लेकिन 2014 में मनोहर लाल खट्टर के मुख्यमंत्री बनने के बाद बीजेपी ने गैर-जाट गोलबंदी और गैर-प्रभावी दलित समुदायों (विशेषकर वाल्मीकि, धानक, खटीक आदि) को साधने की रणनीति अपनाई, जिसे मौजूदा मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी भी आगे बढ़ा रहे हैं।
हरियाणा में अनुसूचित जाति (SC) की आबादी लगभग 20% है:
-
जाटव (Jatavs): यह दलितों में सबसे बड़ा और संगठित समूह है, जो पारंपरिक रूप से कांग्रेस और बीएसपी का मजबूत वोट बैंक माना जाता है।
-
अन्य दलित जातियाँ (Non-Jatav SCs): इसमें वाल्मीकि, धानक, मजहबी सिख और खटीक जैसी जातियाँ आती हैं।
चुनावी गणित (Lokniti-CSDS डेटा): 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव आंकड़ों के अनुसार, जाटव समुदाय का 50% वोट कांग्रेस को गया, जबकि अन्य अनुसूचित जातियों (Non-Jatav SCs) का 45% वोट बीजेपी के पक्ष में गिरा। बीजेपी की पूरी रणनीति जाटव वोटों को अन्य दलित जातियों से अलग (split) करके निर्णायक बढ़त हासिल करने की है।
उप-वर्गीकरण (SC Sub-classification) और आरक्षण का कार्ड
अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुसूचित जातियों के उप-वर्गीकरण की अनुमति दिए जाने के बाद, हरियाणा ऐसा करने वाला पहला राज्य बना:
-
वंचित अनुसूचित जाति (DSC): 20% SC कोटा में से 10% आरक्षण वाल्मीकि, धानक, मजहबी सिख जैसी 36 वंचित दलित जातियों को दिया गया।
-
अन्य अनुसूचित जाति (OSC): शेष 10% आरक्षण जाटव और चर्मकार समुदायों के लिए रखा गया।
मई 2025 में ग्रुप-D के 7,596 पदों की भर्ती में 605 पद DSC और 604 पद OSC के लिए आरक्षित किए गए। यह कदम केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर वंचित जातियों को साधने का एक ठोस प्रयास था।
आरएसएस का वैचारिक ढाँचा और एकीकृत हिंदू पहचान
बीजेपी की यह रणनीति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के उस आह्वान से मेल खाती है, जिसमें उन्होंने बार-बार जातियों के भेद को मिटाकर एकीकृत हिंदू समाज बनाने की बात कही है।
-
दलित अस्मिता बनाम हिंदू पहचान: राजनीति विज्ञानी कृष्ण कुमार के अनुसार, दलितों के भीतर भी वैचारिक धाराएं रही हैं—जहाँ एक तरफ कांशीराम की बीएसपी ने बहुजन पहचान को आगे बढ़ाया, वहीं वाल्मीकि समुदाय अपनी विशिष्ट धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को रामायण और हिंदू धर्मग्रंथों से जोड़कर देखता है।
-
सांस्कृतिक समावेश: बीजेपी इसी जगह अपनी पैठ बना रही है। वह अम्बेडकरवादी ‘जय भीम’, समुदाय-विशेष की ‘जय वाल्मीकि’ और व्यापक धार्मिक ‘जय श्री राम’ को एक ही मंच पर ले आई है। सोशल मीडिया पर युवा वाल्मीकि खुद को “सबसे कट्टर हिंदू” के रूप में पेश कर रहे हैं।
हरियाणा में बीजेपी तीन धाराओं को एक साथ जोड़ने का प्रयास कर रही है—अम्बेडकरवादी गरिमा, वाल्मीकि सामुदायिक स्वाभिमान और भगवान राम के नेतृत्व में एक वृहद हिंदू पहचान।
दलितों के एक वर्ग को व्यापक हिंदू छतरी के नीचे लाकर और उन्हें संसाधनों में हिस्सा देकर बीजेपी ने चुनावी राजनीति का नया फॉर्मूला तैयार किया है। हालांकि, यह रणनीति दलित राजनीति को एकीकृत करेगी या जाटव बनाम गैर-जाटव के बीच ध्रुवीकरण को और गहरा करेगी, यह आने वाला समय ही तय करेगा।