बिहार की बौद्धिक परंपरा : पांडुलिपियाँ, चित्र एवं अभिलेख

– पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए अखिल भारतीय अभियान
– अभियान तीन महीने तक चलेगा
– कोई भी व्यक्ति , संस्थान किसी भी पाण्डुलिपि को संरक्षण करने के लिए पहल कर सकते हैं
– ज्ञान भारतम मोबाइल एप्लीकेशन” ऐप के माध्यम से जानकारी सरकार के साथ साझा कर सकती है

पटना| राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण (ज्ञानभारतम के अंतर्गत), संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के द्वारा देशभर में पांडुलिपियों के संरक्षण, संवर्धन एवं उनके महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में दिनांक 16 मार्च 2026 को बिहार राज्य अभिलेखागार निदेशालय, खुदाबख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी एवं बिहार संग्रहालय के संयुक्त तत्वावधान में “बिहार की बौद्धिक परंपरा : पांडुलिपियाँ, चित्र एवं अभिलेख” विषय पर एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।

प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए श्री कृष्ण कुमार, निदेशक, सांस्कृतिक कार्य निदेशालय ने कहा कि बिहार की बौद्धिक एवं सांस्कृतिक परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है। ऐसी प्रदर्शनियाँ न केवल हमारी ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित रखने में सहायक होती हैं, बल्कि आमजन, विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को अपने इतिहास और ज्ञान परंपरा से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम भी बनती हैं। उन्होंने पांडुलिपियों के संरक्षण एवं अध्ययन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है।

इस अवसर पर अभिलेख निदेशक डॉ. मोहम्मद फैसल अब्दुल्लाह ने कहा कि प्रदर्शनी में प्रदर्शित पांडुलिपियाँ, चित्र एवं अभिलेख बिहार की समृद्ध बौद्धिक परंपरा की झलक प्रस्तुत करते हैं। इससे आमजन, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को समझने का अवसर प्राप्त होगा।

पटना संग्रहालय के अंतर्गत बिहार रिसर्च सोसायटी में प्राचीन पांडुलिपियों का एक अद्वितीय संग्रह सुरक्षित है, जिसमें विभिन्न भाषाओं और लिपियों में लिखी लगभग 10,000 से अधिक पांडुलिपियाँ संरक्षित हैं। इन पांडुलिपियों में प्रमुख रूप से महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा तिब्बत से लायी गई पांडुलिपियाँ शामिल हैं, जो बौद्ध दर्शन, धर्म, इतिहास, व्याकरण, कविता, चिकित्सा, ज्योतिष, यात्रा-वृत्तांत तथा अन्य विषयों से संबंधित हैं। इन पांडुलिपियों में कांग्यूर, तांग्यूर तथा मिश्रित श्रेणी की पांडुलिपियाँ भी सम्मिलित हैं, जिनकी लिपियाँ मुख्यतः सम्भोटा एवं तिब्बती हैं।

प्रदर्शनी में 36 विषयों पर केंद्रित 72 पांडुलिपियों के डिजिटल अभिलेख प्रदर्शित किए गए हैं। इन पांडुलिपियों में विषयों की विविधता, सुलेख तथा चित्रांकन दर्शकों का विशेष ध्यान आकर्षित करते हैं।
आज दिनांक 16 मार्च से पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए एक अभियान चलाया जा रहा है। यह अभियान तीन महीने तक चलेगा। इसके अंतर्गत कोई भी व्यक्ति , संस्थान किसी भी पाण्डुलिपि को संरक्षण करने के लिए पहल कर सकते हैं। इसी पहल के अंतर्गत “ज्ञान भारतम मोबाइल एप्लीकेशन” भी लांच किया गया है। इस ऐप के माध्यम से कोई भी व्यक्ति या संस्था अपनी पांडुलिपियों की जानकारी सरकार के साथ साझा कर सकती है ।

इसके अतिरिक्त प्रदर्शनी में बिहार के इतिहास से जुड़े महत्वपूर्ण अभिलेख भी प्रदर्शित किए गए हैं, जिनमें बाबू कुंवर सिंह तथा 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित दस्तावेज़ प्रमुख हैं। इनमें 1852 से 1856 के बीच कुंवर सिंह द्वारा लिखे गए महत्वपूर्ण पत्र, प्रशासनिक पत्राचार, टेलीग्राम तथा विद्रोह से संबंधित न्यायिक एवं प्रशासनिक अभिलेख शामिल हैं।

प्रदर्शनी का एक प्रमुख आकर्षण डुमरांव एवं बक्सर के राजाओं तथा बाबू कुंवर सिंह के परिवार का वंशावली चार्ट भी है। इसके साथ ही 1858 में शाहाबाद के कलेक्टर द्वारा पटना प्रमंडल के कमिश्नर को भेजा गया एक महत्वपूर्ण पत्र भी प्रदर्शित किया गया है, जिसमें कुंवर सिंह एवं अमर सिंह की संपत्तियों तथा डुमरांव राज, बक्सर और जगदीशपुर परिवार के इतिहास का उल्लेख है।

इसके अतिरिक्त प्रदर्शनी में परगना भागलपुर की ‘एकबंदी टोडरमल’ जैसे महत्वपूर्ण अभिलेख भी प्रदर्शित किए गए हैं, जो तत्कालीन राजस्व प्रशासन की व्यवस्था को दर्शाते हैं।

इस अवसर पर रणवीर सिंह राजपूत, अशोक कुमार सिन्हा, सुनील कुमार झा, मो. असगर तथा आंतरिक वित्तीय सलाहकार श्री राणा सुजीत कुमार टुनटुन सहित अनेक विद्वान एवं अधिकारी उपस्थित रहे। कार्यक्रम को सफल बनाने में श्री उदय कुमार ठाकुर (सहायक अभिलेख निदेशक), डॉ. रश्मि किरण, डॉ. भारती शर्मा, डॉ. शारदा शरण, श्री रामकुमार सिंह, डॉ. पल्लवी आनंद, श्री सरफराज आलम, मो. असलम, पुरालेखपाल एवं प्रोग्रामर का विशेष योगदान रहा।

इस प्रदर्शनी में जे.डी. विमेन्स कॉलेज, पटना की बड़ी संख्या में छात्राएँ भी शामिल हुईं, जिन्होंने प्रदर्शित पांडुलिपियों एवं अभिलेखों के माध्यम से बिहार की समृद्ध बौद्धिक एवं ऐतिहासिक विरासत के बारे में जानकारी प्राप्त की।

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