हम एआई क्यों नहीं सीख पाते?

अगर जूते याद ही आने हैं तो प्रेमचंद के फटे जूते याद आते न? भला नवाब साहब के जूतों में ऐसा क्या साहित्यिक या दार्शनिक होगा जो हमें नवाब साहब के जूते याद आये? कोई भी सुनने वाला हमसे यही प्रश्न पूछेगा। असल में नवाब साहब के जूतों की कहानी असली है भी या किसी ने अतिशयोक्ति अलंकार जोड़कर बनाई है, वो भी हमें पता नहीं। हाँ ये जरूर है कि नवाब साहब के जूतों से हमें बात आसानी से समझ में आ जाती है। जूतों से आसानी से जिसे समझाया न जा सके, भला ऐसा भी कोई होता है?

खैर, तो नवाब साहब के जूतों का किस्सा कुछ यूँ है कि नवाब साहब के हाथ गद्दी तो आ गयी थी, लेकिन उनका मन नाचने गाने में लगता था। इतना अधिक लगता था कि एक बार जब उनके नाचने गाने पर भड़के हुए उनके अब्बू ने उन्हें सुधारने के लिए दरबार में डांटने बुलाया तो वो घुंघरू बाँधे-बाँधे ही दरबार में हाजिर हो गए! अब तो भड़ककर उनके अब्बू ने खूब खरी-खोटी सुनाई और दरबार से घुंघरुओं की छन्न-छन्न बंद करके निकल जाने कहा। जनाब मुड़े और दरबार से बाहर चल दिए। कहते हैं, लोग हक्के-बक्के देखते रहे और कई कदम चलकर दरबार से बाहर निकलने में उनके पैरों का एक भी घुंघरू नही बजा!

सचमुच ऐसा हो सकता है या नहीं, पता नहीं, लेकिन ये कहानी उनके जूतों की है तो जूतों का किस्सा ये था कि यही आगे चलकर नवाब बने और इनपर फिरंगियों ने हमला कर दिया। नाचने-गाने में डूबे नवाब ने क्या सत्ता-सेना देखी होगी? हार तय थी, शत्रु महल तक आने को थे और खबर सुनकर नवाब के सारे नौकर-चाकर, हरम की औरतें, सभी भाग गए। फिरंगी पहुंचे तो नवाब को अकेला तख्त पर बैठा पाया। आश्चर्यचकित होकर उन्होंने पूछा, नवाब साहब जब इतना वक्त था कि सब भाग निकले तो आप क्यों गिरफ्तार होने के लिए यहाँ बैठे रहे? आप भी भाग जाते?

नवाब साहब बोले, भागता कैसे? कोई तख्त के नीचे से जूते निकालकर पहनाता तब ना? कोई जूते निकालकर पहनाने वाला था ही नहीं, इसलिए नवाब साहब जान बचाकर खाली पाँव नहीं भाग पाए।

नवाब साहब के जूतों का किस्सा एआई की वजह से याद आया था। कुछ दिन पहले मंत्री जी यानी अश्विनी वैष्णव जी ने मुफ्त एआई प्रशिक्षण की घोषणा की और हमने ढूँढा तो उसकी वेबसाइट भी मिल गयी। थोड़े प्रयास में रजिस्टर किया, फिर कुछ घंटे ऑनलाइन कोर्स में लगे तो पास करने के सर्टिफिकेट भी आने लगे। सर्टिफिकेट दिखे तो एआई से नौकरियाँ तो नही जायेंगी, ये सोचकर घबराए लोगों से लेकर आईआईटी से थोड़े कम अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने वालों तक ने पूछा कि ये कोर्स कैसे किये जा सकते हैं? जिन्हें बताया उनसे जब कुछ दिन बाद पूछा कि ढूंढकर ज्वाइन किया क्या? सबका जवाब नहीं था।

कुछ को तो समय ही नहीं मिल पाता न, वो मोदी जी से ज्यादा बिजी लोग हैं। दूसरे कुछ लोगों की समस्या थी कि ये कोर्स हिंदी में नहीं होते ना, इसलिए नहीं सीख सकते। नवाब साहब को कोई जूते पहना दे तब तो भागेंगे न? बड़ी कठिन समस्या है भाई!

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