बिहार की सारण घटना: जातिगत नफरत की भयावह सच्चाई और समाज की चुप्पी

बिहार के सारण जिले में हाल ही में घटी एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। 12 मार्च 2026 की शाम को एक 16 वर्षीय राजपूत समुदाय की कक्षा 10 की छात्रा को उसके गांव के पांच पुरुषों द्वारा अपहरण कर लिया गया, सामूहिक बलात्कार किया गया और फिर जीवित अवस्था में कुएं में फेंक दिया गया। पीड़िता की चीखें सुनकर परिवार वाले पहुंचे, लेकिन अपराधी पहले ही उसे मौत के मुंह में धकेल चुके थे। अगले दिन, 13 मार्च को उसकी लाश कुएं से बरामद हुई। आरोपी मांझी या पासवान समुदाय से बताए जा रहे हैं, और पुलिस ने एक आरोपी को गिरफ्तार किया है, जबकि बाकी चार फरार हैंयह घटना महज एक अपराध नहीं, बल्कि जातिगत नफरत की गहरी जड़ों का प्रमाण है, जो हमारे समाज को अंदर से खोखला कर रही है।
इस घटना के पीछे की कहानी और भी डरावनी है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही रिपोर्ट्स के अनुसार, अपराधियों ने न केवल पीड़िता पर अत्याचार किया, बल्कि व्हाट्सएप पर अपनी ‘बहादुरी’ का बखान भी किया। यह सिर्फ एक व्यक्तिगत अपराध नहीं लगता; इसमें जातिगत पूर्वाग्रह की बू आती है। ऊपरी जातियों के खिलाफ बढ़ती नफरत, जो राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर पनप रही है, ऐसी घटनाओं को जन्म दे रही है। बिहार जैसे राज्य में, जहां जाति राजनीति का आधार है, ऐसी घटनाएं असामान्य नहीं हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी व्यवस्था इस नफरत को रोकने में सक्षम है? या फिर यह राजनीतिक लाभ के लिए जानबूझकर नजरअंदाज की जा रही है?
बिहार की राजनीति हमेशा से जाति पर आधारित रही है। नीतीश कुमार की सरकार, जो जद(यू) और भाजपा की गठबंधन वाली है, ने हाल ही में आरक्षण की सीमा बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने का फैसला किया था। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दिया गया, लेकिन इससे ऊपरी जातियों में असंतोष फैला। सारण घटना इसी असंतोष की उपज लगती है। अपराधी, जो इतिहासशीटर हैं और पहले भी ऐसे अपराधों में शामिल रहे हैं, क्या उन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है? पुलिस की निष्क्रियता इस संदेह को बल देती है। घटना के बाद पुलिस ने तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं की? क्यों अपराधी आराम से फरार हो गए? यह सवाल उठते हैं कि क्या एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है, जिससे ऊपरी जातियों के खिलाफ मामले कमजोर पड़ जाते हैं
समाज में जातिगत नफरत का जहर कैसे फैल रहा है, इसका एक उदाहरण सोशल मीडिया है। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर अजीत भारती जैसे प्रभावशाली व्यक्ति ने इस घटना को उठाया, और इसे ऊपरी जातियों के खिलाफ सिस्टेमेटिक घृणा से जोड़ा। उन्होंने कहा कि दलित समुदायों में ब्राह्मण या राजपूत लड़कियों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जो अनियंत्रित हैयह बात सही लगती है। हाल के वर्षों में, सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट्स आम हैं जहां ऊपरी जातियों को अपमानित किया जाता है, और यह नफरत वास्तविक जीवन में हिंसा का रूप ले लेती है। लेकिन क्या मुख्यधारा का मीडिया इस पर ध्यान देता है? नहीं, क्योंकि जातिगत राजनीति में यह ‘संवेदनशील’ मुद्दा माना जाता है। अगर पीड़िता दलित होती, तो शायद पूरे देश में आंदोलन छिड़ जाता। लेकिन यहां चुप्पी है, जो बताती है कि हमारा न्याय तंत्र भी जाति से प्रभावित है।
इस घटना को व्यापक संदर्भ में देखें तो बिहार में महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में बलात्कार के मामले देश में सबसे ऊपर हैं। लेकिन जब जाति जुड़ जाती है, तो मामला और जटिल हो जाता है। सारण जैसे ग्रामीण इलाकों में, जहां गरीबी और अशिक्षा व्याप्त है, जातिगत संघर्ष आम हैं। पीड़िता एक गरीब राजपूत परिवार से थी, और अपराधी स्थानीय दबंग था। यह शक्ति असंतुलन की कहानी है। क्या सरकार ने ऐसे इलाकों में पुलिसिंग मजबूत की? नहीं। बजाय इसके, राजनीतिक दल वोट बैंक के लिए जातिगत समीकरण साधते रहते हैं। भाजपा, जो ऊपरी जातियों का समर्थन करती है, को भी इस पर सख्त रुख अपनाना चाहिए, लेकिन ऐसा लगता है कि वे भी गठबंधन की मजबूरियों में फंसे हैं
समाज सुधार की बात करें तो हमें जातिगत नफरत को जड़ से उखाड़ना होगा। शिक्षा और जागरूकता अभियान चलाने चाहिए, जहां सभी समुदायों को एक साथ लाया जाए। लेकिन यह आसान नहीं। आरक्षण जैसे मुद्दे, जो सामाजिक न्याय के नाम पर हैं, कभी-कभी विभाजन पैदा करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 50 प्रतिशत की सीमा तय की है, लेकिन राज्य सरकारें इसे तोड़ने की कोशिश करती हैं। इससे ऊपरी जातियाँ खुद को पीड़ित महसूस करती हैं, और नफरत बढ़ती है। सारण घटना इस चक्र का हिस्सा है। अपराधियों को सख्त सजा मिलनी चाहिए – फांसी की मांग सोशल मीडिया पर उठ रही है
लेकिन सिर्फ सजा से काम नहीं चलेगा; हमें सिस्टेम बदलना होगा। पुलिस को जातिगत पूर्वाग्रह से मुक्त करना, फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाना और महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष योजनाएं लागू करनी होंगी।अंत में, सारण की यह घटना एक चेतावनी है। अगर हम जातिगत नफरत को अनदेखा करते रहे, तो ऐसी और घटनाएं होंगी। पीड़िता के परिवार को न्याय मिलना चाहिए, और समाज को एकजुट होकर इस जहर के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। राजनीतिक दलों से अपील है कि वोट की राजनीति छोड़कर इंसाफ की राजनीति करें। अन्यथा, हमारा समाज टूट जाएगा। इस घटना ने साबित कर दिया कि जाति का जहर कितना घातक है – अब समय है जागने का।

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