दरभंगा (बिहार विमर्श)। आखिरकार नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के कड़े रुख और स्पष्ट आदेश के बाद दरभंगा जिला प्रशासन को अपनी नींद से जागना ही पड़ा। दरभंगा की ऐतिहासिक पहचान कहे जाने वाले ‘गंगा सागर’ तालाब के पश्चिमी तट पर बने अवैध मकानों को ध्वस्त करने के लिए हथौड़े चलने शुरू हो गए हैं। जब पहली बार यह खबर मिली, तो एक पल के लिए सहसा विश्वास ही नहीं हुआ।
इस ऐतिहासिक मोड़ की पुष्टि के लिए जब अभियान के अग्रदूत नारायण चौधरी से फोन पर बात हुई, तो वर्षों बाद उनके स्वर में एक अलग ही उल्लास और संतोष था। उन्होंने गदगद भाव से कहा— “चौदह साल का अनवरत संघर्ष आज सफल होता हुआ दिख रहा है।”
निराशा, अवसाद और तंत्र की चुप्पी से उपजा संघर्ष
इन 14 वर्षों की राह कभी आसान नहीं रही। इस दौर में कई ऐसे भी क्षण आए, जो घने अवसाद और निराशा से भरे थे। दिन-दहाड़े ऐतिहासिक तालाबों को मिट्टी और कचरे से भरा जाता था और आसपास के लोग असहाय मूकदर्शक बने रहते थे।
‘तालाब बचाओ अभियान’ से जुड़े जांबाज साथी हर तरह का खतरा मोल लेते हुए पुलिस और प्रशासन से लिखित शिकायतें करते थे, तालाब भरे जाने के वीडियो बनाते और तस्वीरें खींचते। लेकिन, तंत्र में व्याप्त अनदेखी के कारण पुलिस और स्थानीय प्रशासन मौन रहकर इन गतिविधियों को होने देता था।
हालाँकि, इस दौरान कुमार रवि और राजीव रौशन जैसे कुछ संवेदनशील जिलाधिकारियों ने फोन पर सूचना मिलते ही कुछ तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कराने की त्वरित पहल की। लेकिन प्रशासनिक सीमाओं के कारण एक समय के बाद प्रत्यक्ष हस्तक्षेप में उनकी भी सीमाएं आ जाती थीं।
निष्ठा और संकल्प की चाय: जीवट नागरिकों का जज्बा
तमाम चुनौतियों, दबावों और निराशा के बावजूद नारायण चौधरी के कुशल नेतृत्व में ‘तालाब बचाओ अभियान’ ने बिना झुके और बिना थके अपना कार्य जारी रखा। महीने में एक या दो बार अभियान के समर्पित सदस्य अपने तमाम पेशेवर, व्यक्तिगत और पारिवारिक दायित्वों को दरकिनार कर केवल दरभंगा के तालाबों की रक्षा के लिए एकत्रित होते थे।
इस अभियान की रीढ़ बने जीवट नागरिकों में—
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अजीत मिश्र
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विद्यानाथ बाबू
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प्रेम मोहन जी
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मो. तासीम नवाब
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इंदिरा झा
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शारदा नंद चौधरी
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आर. बी. खेतान
जैसे प्रबुद्ध लोग हर बैठक में आते और दरभंगा के जल-स्रोतों व पर्यावरण की रक्षा का अपना संकल्प दोहराते। बैठक के अंत में सुभाष जी के हाथों से बनी विशेष नींबू की चाय की चुस्कियों के साथ आंदोलन को आगे बढ़ाने की रणनीति तैयार होती थी।
पत्रकारों का साथ और मैथिली साहित्य परिषद की भूमिका
इस आंदोलन को 14 वर्षों तक जीवित रखने और जन-आंदोलन का रूप देने में दरभंगा और बिहार के पत्रकार मित्रों का अमूल्य योगदान रहा। अभियान की छोटी से छोटी पहल, बैठक या विरोध प्रदर्शन की पत्रकारों ने जिस तत्परता और संवेदनशीलता के साथ रिपोर्टिंग की, उसने इस लड़ाई को एक नैतिक ताकत दी।
तालाबों को बचाने के लिए जितने गंभीर विचार-विमर्श मैथिली साहित्य परिषद के प्रांगण में हुए, उतने ही वैचारिक मंथन दरभंगा के स्थानीय समाचार पत्रों के दफ्तरों में भी आयोजित किए गए।
जब कमलेश जी ने दिखाया न्यायालय का रास्ता
इस संघर्ष की राह में कमलेश जी का आगमन एक मील का पत्थर साबित हुआ। उनके जुड़ने से आंदोलन को एक नई रणनीतिक दिशा मिली। हौज खास (दिल्ली) में नारायण जी के साथ एक बरसाती दोपहर की पहली मुलाकात याद आती है, जब कमलेश जी ने बड़े विश्वास के साथ कहा था— “समय जरूर लगेगा, हो सकता है कि अपेक्षा से ज्यादा समय लगे… लेकिन इन तालाबों से अतिक्रमण हटकर रहेगा और इसका रास्ता अदालत के दरवाजे से ही निकलेगा।”
आज उनकी कही बात शत-प्रतिशत सच साबित हुई है।
चेत जाएं जमीन के लोभ में अंधे लोग: आज हथौड़ा, कल बुलडोजर!
गंगा सागर तालाब के बीचों-बीच बना वह लाल रंग का बहुमंजिला मकान सालों से दरभंगा के हर पर्यावरण-प्रेमी और संवेदनशील नागरिक के सीने में तीर की तरह चुभता रहा है। वह अकेला मकान नहीं है, बल्कि ऐसे हजारों अवैध निर्माण हैं, जो हमारे जागरूक नागरिक होने पर सवाल खड़ा करते हैं।
आज अवैध निर्माणों पर हथौड़ा चलने की शुरुआत हुई है, कल बुलडोजर भी चलेंगे और परसों वे अवैध बगीचे भी खोदे जाएंगे जो तालाबों को पाटकर बनाए गए हैं।
‘तालाब बचाओ अभियान’ का स्पष्ट संदेश है:
“जमीन के लोभ में अंधे हो चुके लोग अब भी चेत जाएं और डरना सीखें। दो-चार महीनों के लिए तबादला होकर आने वाले पुलिस या अंचलाधिकारी (अमीन/तहसीलदार) के क्षणिक आश्वासनों में न आएं। तालाब, पोखरों और नदियों की जमीनों पर अपने मकान न बनाएं। आज नारायण जी के नेतृत्व में, तो कल मोहम्मद तासीम नवाब के नेतृत्व में किसी न किसी ‘दीवाने की टोली’ जरूर आएगी और आपकी आने वाली पीढ़ियों के हक की इस जमीन का पाई-पाई हिसाब मांगेगी।”
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