धूल भरी किताबों से परे – ए.के. रामानुजन की “फोकटेल्स फ्रॉम इंडिया”
क्या आपको याद है जब बचपन में नानी या दादी कहानी सुनाती थीं? वे कहानियाँ किसी स्कूल की किताब में नहीं थीं, लेकिन उनमें एक जादू था। वे कहानियाँ हमें हंसाती थीं, डराती थीं, और कल्पनाओं के एक ऐसे लोक में ले जाती थीं जहाँ सब कुछ संभव था। आज के डिजिटल युग में हम…