सीतामढ़ी के फेसबुक पेज से
वर्षों से नाण्यदेव की कहानियाँ सुनते सुनते आज जब कर्नाट वंश के प्रथम राजधानी नानपुर पहुँचा तो तालाब के किनारे मंदिर के अवशेष को देखते ही बहुत बड़े और संपन्न सभ्यता के होने का आभास हुआ । मैं हरिसिंहदेव , गंगदेव, मोती सिंह देव सबको महसूस कर पा रहा था । आज़ादी के बाद से सीतामढ़ी या मुजफ्फरपुर को लेकर ऐतिहासिक हीनता का भाव ऐसा भड़ दिया गया की हमे कभी महसूस ही नहीं होता की हम भौगौलिक तौर पर किसी इतिहास का हिस्सा रहे होंगे । अवशेष के खोज में जब आगे बढ़ा तो राकेश जी ने महल के मुख्य द्वार के बचे होने की बात बतायी । १९३४ के भूकंप में महल और मंदिर तहस-नहस हो गए

पान के दुकान के सामने वाले नाले के ऊपर मंदिर में इस्तेमाल किए गए सैंडस्टोन स्लैब कचरे के जैसे पड़े हुए थे । खैर , मुख्य द्वार के ललाट आज भी तने हुए थे , जैसे मुझे गर्व से अपने अस्तित्व का एहसास करा रहे हों और मेरी चेतना को इस गौरवशाली इतिहास को जन जन तक ले जाने का आदेश दे रहे हों । मैंने पंजी प्रथा का चर्चा किया तो सभी स्थानीय लोग अपनी अपनी जानकारी साझा करने लगे , फिर मैंने नाण्यदेव की घोड़े पर बैठे हुए एक आंध्रा थाड़ी की उकेरी हुई तस्वीर दिखायी जिसे स्थानीय लोग ब्रह्म स्थान में रखे ब्रह्म बाबा से तुरंत जोड़ लिए और कहे कि यही तो यहाँ के नानकबाबा हैं ।

समय के साथ साथ नान्यदेव का अपभ्रंश नानकबाबा हो गया , मगर आश्चर्य यह है कि कर्नाट शैली के मंदिर और पत्थर पर उकेरी जाने वाली कलाकृतियाँ साथ ही साथ घोड़े पर बैठे नाण्यदेव की ब्रह्मस्थान में आज तक पूजन होना इस गौरवशाली इतिहास को पुनर्जीवित करने को काफ़ी है । अब वक़्त है कि राष्ट्र के सभी इतिहासकारों और पुरातत्वविद को बुला कर नाण्यपुर डायलॉग की शुरुआत की जाये । मैं सरकार से अपेक्षा नहीं रखता और सरकार के लिए और भी ढेर सारे काम हैं , सरकार साथ आती है तो बढ़िया नहीं आती है तो और भी बढ़िया । जिस सरकार को आजतक चिरांद समझ नहीं आया उस सरकार को मैं नाण्यदेव की कहानी से नहीं जगा सकता ।

राम शरण अंकल जब मुझे कहते थे की सीतामढ़ी पुरातत्व से भरपूर है तो कभी कभी मैं भी अतिशयोक्ति समझता था मगर यथार्थ यही है की हमारी मातृभूमि पौराणिक भी है और ऐतिहासिक भी है ।