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मिथिला चित्रकला को विश्व पटल पर अमर करने वाली कालजयी चितेरी: पद्मश्री महासुंदरी देवी

संपादकीय आलेख | बिहार विमर्श

बिहार की लोक-संस्कृति और कला की जब भी बात होगी, मिथिला चित्रकला (मधुबनी पेंटिंग) का नाम सबसे ऊपर आएगा। इस पारंपरिक लोक कला को झोपड़ियों और कोहबर की दीवारों से निकालकर वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने का श्रेय जिन विदुषी महिलाओं को जाता है, उनमें पद्मश्री महासुंदरी देवी का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।

संघर्षों से घड़ा बचपन और कला का बीजारोपण

15 अप्रैल 1922 को मधुबनी जिले के चतरा गाँव में जन्मी महासुंदरी देवी का जीवन शुरुआती दिनों से ही संघर्षों से घिरा रहा। महज 5 वर्ष की अल्पायु में माता-पिता का साया सिर से उठ जाने के बाद उनका पालन-पोषण उनके चाचा पुनीत लाभ और चाची देवसुंदरी देवी ने किया। औपचारिक स्कूली शिक्षा न मिलने के बावजूद, उन्होंने अपनी चाची से पारंपरिक कोहबर और मिथिला कला के गुर सीखे। 18 वर्ष की आयु में रांटी गाँव के शिक्षक कृष्ण कुमार दास जी से उनका विवाह हुआ, जिन्होंने उनके कलात्मक जीवन को सदैव प्रोत्साहन दिया।

पर्दा प्रथा त्याग कर रचा इतिहास

वर्ष 1961 में, तत्कालीन समाज की कठोर पर्दा-प्रथा को तोड़कर महासुंदरी देवी ने एक स्वतंत्र कलाकार के रूप में बाहर कदम रखा। वे मिथिला चित्रकला की ‘कचनी शैली’ में निष्णात थीं, जिसमें धागे को रंगों में डुबोकर अत्यंत महीन और सजीव रेखांकन किया जाता है।

वे केवल कैनवास या कागज तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने साड़ी, लकड़ी, माटी (क्ले आर्ट), सुजनी कढ़ाई और सिक्की कला में भी अमूल्य योगदान दिया।

  • भित्तिचित्र व बड़ी कृतियाँ: पटना के ‘होटल पाटलिपुत्र अशोक’ और राज्य सभा परिसर के लिए उनके द्वारा निर्मित 66 फीट का विशाल भित्तिचित्र उनकी कलात्मक पराकाष्ठा का प्रमाण है।

  • सार्वजनिक स्थानों पर कला: उन्होंने मधुबनी रेलवे स्टेशन और प्रसिद्ध ‘जयंती जनता एक्सप्रेस’ ट्रेन को भी अपनी चित्रकारी से सुसज्जित किया।

महिला स्वावलंबन की संवाहक

कला साधना के साथ-साथ उन्होंने सामाजिक व आर्थिक रूप से ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने का बीड़ा उठाया। इसके लिए उन्होंने ‘मिथिला हस्तशिल्प कलाकार औद्योगिक सहयोग समिति’ नामक सहकारी संस्था की स्थापना की, जिसने सैकड़ों महिलाओं को रोजगार और पहचान दी।

सम्मान और पुरस्कार

महासुंदरी देवी की कला यात्रा को देश-विदेश में अपार सराहना मिली:

  • राष्ट्रीय पुरस्कार (1982): भारत सरकार द्वारा सम्मानित।

  • तुलसी सम्मान (1995): मध्य प्रदेश सरकार का प्रतिष्ठित लोक कला सम्मान।

  • शिल्प गुरु पुरस्कार (2007): कपड़ा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च शिल्प सम्मान।

  • पद्मश्री (2011): भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से विभूषित।

अमर विरासत

4 जुलाई 2013 को 92 वर्ष की आयु में इस महान चित्रकार का निधन हुआ और उनका अंतिम संस्कार पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ किया गया। आज उनकी विरासत को उनकी पुत्रवधुएं (विभा दास, आभा दास) और उनके द्वारा तराशे गए कलाकार (जैसे पद्मश्री दुलारी देवी) आगे बढ़ा रहे हैं। महासुंदरी देवी केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आत्मबल और स्वावलंबन का जीवित प्रतीक हैं।

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